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Bilaspur News: कलम ने खोली समाज की परतें, संगोष्ठी में गूंजे संवेदनाओं के स्वर

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वरिष्ठ नागरिक सभागार में आयोजित कल्याण कला मंच की मासिक संगोष्ठी में उपस्थित साहित्यकार व अन्य।
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कल्याण कला मंच की गोष्ठी में कवियों ने रचनाओं के माध्यम से समाज की पीड़ा और बदलते रिश्तों को किया उजागर
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बुजुर्गों की उपेक्षा, शहर की समस्याओं और सामाजिक सरोकारों पर हुआ मंथन

संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। कल्याण कला मंच की मासिक संगोष्ठी वरिष्ठ नागरिक सभागार में आयोजित की गई। इसकी अध्यक्षता सुरेंद्र मिन्हास ने की। उन्होंने समाज में आज बूढ़े लोगों की स्थिति और अपने ही बच्चों की ओर से की जा रही उपेक्षा और बिलासपुर मुख्यालय की फोरलेन के कारण हुई वीरानगी और कारोबार चौपट होने पर गहन विचार-विमर्श किया गया। वरिष्ठ साहित्यकार जीत राम सुमन ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। जगदीश सहोता ने मंगल ध्वनि प्रस्तुत की। कलाकार श्याम सुंदर सहगल ने तेज राम तेजस का जीवन वृत्त पढ़ा। वरिष्ठ साहित्यकार अमरनाथ धीमान ने कर्मबीर कंडेरा का जीवन वृत्त पढ़ा। इस अवसर पर तेज राम तेजस और कर्मबीर कंडेरा को पुष्प हार पहनाकर, प्रशस्ति पत्र और दुर्गा माता की दिव्य रक्षा कवच देकर अलंकृत किया गया। इस अवसर पर सुख राम आजाद ने मुख्यातिथि के रूप में शिरकत की।
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द्वितीय सत्र में कविता पाठ किया गया। हमीद खान ने बंसरी बजांदा गीतां ने बुलांदा इक छोहरू मेरी हाणा रा, अनिल शर्मा नील ने औरों को किया उजाला, हमारे यहां अंधेरा डाला, नौ अगस्त उन्नीस सौ इकसठ का दिन आया काला, अमर नाथ धीमान ने तेरा हाथ मेरे हाथ के बहुत करीब था, शिव नाथ सहगल ने दीवाने का नाम तो पूछो, रविंद्र शर्मा ने चुनाव का मौसम आया, पूनम शर्मा ने जब जंगलों की जगह कंक्रीट उगी नदियों का मार्ग बांधा गया, रामपाल डोगरा ने काली-काली बरसात की बदली, जीत राम सुमन ने ना जाने मेरे वतन को ये नजरें बुरी लगने लगी हैं, जगदीश सहोता ने दिल पे कसमें खाते हैं जाम पे गुजरते हैं, रविंद्र कमल चंदेल ने एक थप्पड़ ही काफी है सुधरने और बिगड़ने के लिए रचना प्रस्तुत की। सुमन चड्ढा ने गालियों का इतिहास, कर्मवीर कंडेरा ने अजब खेल है तेरा रुद्र रूप में बरस रहे हैं, राकेश मिन्हास ने दरिया का सारा नशा उतरता चला गया, चिंता देवी ने कालिए-कालिए बदलिए तू जल्दी-जल्दी बरसेयां, श्याम सुंदर सहगल ने यादां तेरिया मैं सीने नाल ला-ला के, तेज राम तेजस ने मैं वो कांच का टुकड़ा था बेजान सा जीवित बुत, सुशील पुंडीर ने एक कविता तुम्हारे नाम लिख दी मैंने मगर अफसोस तुम्हारे लिए कुछ न लिख पाया, निगाह कविता में बेवा नारी की व्यथा हुसैन अली ने यूं व्यक्त की मिला करता है एक खत अकसर कब्र के सिरहाने से, बाबू राम धीमान ने छाई होर लड़ाइयां रा क्या बधाणा कजो करना गुस्सा तां कजो दुख मनाणा, जय महलवाल ने रिश्ते हो गए तार तार, ओंकार कपिल ने तुम जो मिल गया तो यह लगता है, सुरेंद्र मिन्हास ने लाइन में खड़े-खड़े बच्चे बूढ़े गश खाकर गिर जाते हैं यदि तोड़ दें लाइन तो नहीं किसी को भी सुहाते हैं, सुख राम आजाद ने भला चंगा सुतुरा था नीदां ते जगाई गे रचना प्रस्तुत की। इस अवसर पर मंच के मुख्य संयोजक अमरनाथ धीमान, इंदु कपिल, महासचिव बाबू राम धीमान आदि उपस्थित रहे।
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