बिलासपुर की जामा मस्जिद में इफ्तार करते हुए। स्रोत: मुस्लिम वेलफेयर
शब-ए-कद्र की पवित्र रात से जुड़ा है अंतिम अशरा, मस्जिदों में बढ़ी रौनक
जामा मस्जिद रौड़ा में रोजाना हो रहा सामूहिक इफ्तार, समाज के लोग दे रहे सहयोग
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। पवित्र रमजान माह अब अपने अंतिम चरण में पहुंच गया है। इस्लाम में रमजान के आखिरी दस दिनों को विशेष महत्व है। मुस्लिम धर्मगुरुओं के अनुसार रमजान के पहले दस दिन रहमत (अल्लाह की मेहरबानी), दूसरे दस दिन मगफिरत यानी गुनाहों की माफी और अंतिम दस दिन जहन्नुम से निजात दिलाने वाले माने जाते हैं। इसलिए इन दिनों रोजेदार इबादत, दुआ और नेक कामों में ज्यादा समय बिताते हैं।
मुस्लिम वेलफेयर सोसायटी के प्रधान नसीम मोहम्मद ने बताया कि रमजान के अंतिम अशरे का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि इसी दौरान आने वाली पवित्र रात शब-ए-कद्र मानी जाती है। इस्लामिक मान्यता के अनुसार लगभग 1400 साल पहले इसी रात पवित्र कुरान का अवतरण हुआ था। बताया जाता है कि कुरान पहले आसमान पर उतारा गया और फिर अलग-अलग मौकों पर पैगंबर मोहम्मद को मिलता रहा। करीब 23 वर्ष में यह पूरा हुआ और पैगंबर मोहम्मद ने इसे अपने अनुयायियों को समझाया। बताया कि इस्लाम के इतिहास के अनुसार अन्य आसमानी किताबें जुबूर, तौरेत और इंजील भी इसी पवित्र माह में अलग-अलग नबियों को प्रदान की गई थीं, जबकि कुरान पाक अंतिम आसमानी किताब मानी जाती है। रमजान के आखिरी दस दिनों में मस्जिदों में इबादत का माहौल और ज्यादा बढ़ जाता है। कई लोग मस्जिदों में एतिकाफ में बैठते हैं। एतिकाफ का मतलब है कि व्यक्ति मस्जिद में रहकर पूरे समय नमाज, कुरान की तिलावत और दुआ में बिताता है। जिले की कई मस्जिदों में लोग एतिकाफ में बैठकर इबादत कर रहे हैं। जामा मस्जिद रौड़ा में पूरे रमजान माह के दौरान रोजाना सामूहिक रोजा इफ्तार का व्यापक प्रबंध किया गया है। इसमें समाज के हैसियतदार लोग बारी-बारी से इफ्तार की व्यवस्था कर रहे हैं। इसके अलावा बैतुलमाल यानी आपसी सहयोग के माध्यम से भी लोग इसमें योगदान दे रहे हैं। नसीम मोहम्मद ने बताया कि समाज के किसी भी वर्ग से जुड़ा व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार रोजा इफ्तार की व्यवस्था कर सकता है। रमजान के महीने में किए गए नेक कामों का सवाब कई गुना बढ़ जाता है, इसलिए लोग बढ़-चढ़कर इसमें हिस्सा ले रहे हैं। रमजान के दौरान मस्जिदों में तरावीह की विशेष नमाज भी अदा की जा रही है। इसमें विद्वान मौलाना रोजाना नमाजियों को कुरान शरीफ की तिलावत सुनाते हैं, जिससे लोग इस पवित्र ग्रंथ के संदेश को समझ सकें और अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करें।