धराड़सानी में पर्यावरण नियमों की अवहेलना करने पर कंट्रोल बोर्ड ने की कार्रवाई
बिना सुरक्षा उपायों के ढलान वाले क्षेत्र में डंपिंग करने से झील में पहुंचा मलबा
समय पर राशि जमा न करने पर बोर्ड ने दी है अधिनियम के तहत कड़ी कार्रवाई की चेतावनी
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। कीरतपुर-मनाली फोरलेन पर धराड़सानी क्षेत्र में गोबिंद सागर झील किनारे अवैध मलबा डंपिंग का मामला गंभीर हो गया है। हिमाचल प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने एक निजी होटल एंड रेस्टोरेंट प्रबंधन पर पर्यावरण नियमों की अवहेलना करने पर एक लाख रुपये का पर्यावरण मुआवजा लगाया है। बिना सुरक्षा उपायों के ढलान वाले क्षेत्र में मलबा डालने से इसका हिस्सा बहकर झील में पहुंच गया, जो सीधे पर्यावरण संरक्षण कानूनों के उल्लंघन की श्रेणी में आता है।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की टीम ने 20 सितंबर 2025 को होटल के समीप स्थित प्लॉट का निरीक्षण किया। निरीक्षण में सामने आया था कि बिना गेबियन, क्रेट वॉल या अन्य सुरक्षा ढांचे के मलबा प्लॉट में भरा गया था। प्लॉट की ढलान अधिक होने के कारण मलबा नीचे बहकर सीधे गोविंद सागर झील में जा रहा था। बोर्ड की टीम को मौके पर बताया गया कि प्लॉट को समतल करने के लिए मलबा डाला जा रहा है। बोर्ड ने उसी दिन आदेश जारी कर झील में गिरे मलबे को तुरंत हटाने और सुरक्षा दीवारें लगाने को कहा। इसके बाद बोर्ड की ओर से कारण बताओ नोटिस भी जारी किया गया, जिसका जवाब होटल प्रबंधन ने 23 सितंबर 2025 को दिया। प्रबंधन ने भारी बारिश और भूस्खलन को मलबा बहने का कारण बताया, जिसे बोर्ड ने संतोषजनक नहीं माना। क्षेत्रीय अधिकारी की रिपोर्ट और समिति की सिफारिशों के आधार पर बोर्ड ने माना कि यह मामला जल (प्रिवेंशन एंड कंट्रोल ऑफ पॉल्यूशन) अधिनियम, 1974 का उल्लंघन है। इसी के चलते बोर्ड ने एनजीटी के आदेश का हवाला देते हुए एक लाख रुपये की पर्यावरण क्षतिपूर्ति निर्धारित की। बोर्ड के सदस्य सचिव डॉ. परवीन चंदर गुप्ता की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि होटल प्रबंधन को यह राशि सात दिनों के भीतर निर्धारित खाते में जमा करनी होगी। समय पर राशि जमा न करने पर बोर्ड अधिनियम के तहत कड़ी कार्रवाई करने के लिए बाध्य होगा।
आदेश की प्रति क्षेत्रीय अधिकारी बिलासपुर को भेजकर निर्देश दिए गए हैं कि वे स्थल का दोबारा निरीक्षण कर अनुपालना रिपोर्ट तुरंत मुख्यालय भेजें। आदेश को बोर्ड की वेबसाइट पर भी अपलोड कर दिया गया है। वहीं, शिकायत करने वाली फोरलेन विस्थापित एवं प्रभावित समिति के पदाधिकारियों का कहना है कि फोरलेन निर्माण के कारण क्षेत्र में पहले से ही भारी मलबा जमा हो रहा है। निजी प्रोजेक्ट्स की ओर से की जा रही ऐसी डंपिंग पर्यावरण और झील की सेहत दोनों के लिए खतरनाक है।