154 स्कूलों के सर्वे में आधारभूत ढांचे, सुरक्षा, समावेशी शिक्षा की गंभीर खामियां उजागर
आधे से अधिक स्कूल बिना चारदीवारी के, आरटीई मानकों पर खरे नहीं उतरे
74 फीसदी स्कूलों में दिव्यांग बच्चों के लिए सुविधा नहीं, 50 फीसदी से ज्यादा स्कूलों में शिकायत पेटियां गायब
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। जिले के सरकारी स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था की जमीनी हकीकत सामने आई है। सामाजिक अंकेक्षण ने कई गंभीर कमियां उजागर की हैं। समग्र शिक्षा योजना के तहत यह अंकेक्षण किया गया था। अधिकांश विद्यालय शिक्षा का अधिकार अधिनियम के मानकों पर खरे नहीं उतरे।
आधारभूत ढांचे, छात्र सुरक्षा, समावेशी शिक्षा और निगरानी तंत्र से जुड़ी कमियां प्रमुखता से सामने आईं। मंगलवार को बिलासपुर में जनसुनवाई हुई। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की टीम ने रिपोर्ट प्रस्तुत की। कार्यक्रम में 600 से अधिक अभिभावकों, शिक्षकों और अधिकारियों ने भाग लिया। शिक्षा गुणवत्ता की उपनिदेशक निशा गुप्ता ने निष्कर्षों की समीक्षा की।
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय की टीम के प्रमुख रणधीर रंता ने बताया कि जिले के 809 स्कूलों में से 154 का मूल्यांकन किया गया। यह कुल स्कूलों का करीब 20 फीसदी है। अंकेक्षण का उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना है। सर्वेक्षण में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के छह मानकों पर 175 से अधिक प्रश्न पूछे गए।
किसी भी स्कूल भवन को आरटीई मानकों के अनुरूप उपयुक्त नहीं पाया गया। करीब 40 फीसदी स्कूलों में पर्याप्त कक्षाओं का अभाव मिला। शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के लिए भी कमरों की कमी पाई गई। वहीं 44 फीसदी स्कूलों में विद्यार्थियों के लिए पर्याप्त फर्नीचर उपलब्ध नहीं है।
पेयजल व्यवस्था सभी स्कूलों में है, लेकिन 80 फीसदी विद्यालयों में सुरक्षित पेयजल नहीं मिला। यह विद्यार्थियों के स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय है। 56 फीसदी स्कूलों में चारदीवारी नहीं है। इससे विद्यार्थियों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। 35 फीसदी से अधिक स्कूलों में स्कूल सुरक्षा समितियों का गठन भी नहीं हुआ है। अंकेक्षण दल के सदस्यों ने छात्राओं की सुरक्षा के लिए चारदीवारी के अभाव को चिंताजनक बताया।
समावेशी शिक्षा की स्थिति भी चिंताजनक है। करीब 74 फीसदी स्कूलों में दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए बाधा-मुक्त पहुंच नहीं है। 85 फीसदी स्कूलों में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए उपयुक्त शौचालय भी नहीं हैं। 14 फीसदी से अधिक स्कूलों में छात्राओं को मासिक धर्म स्वच्छता पैड नहीं मिल रहे हैं।
50 फीसदी से अधिक स्कूलों में शिकायत एवं सुझाव पेटियां उपलब्ध नहीं हैं। किसी भी स्कूल में पेशेवर परामर्श सेवाएं भी नहीं मिलीं। क्षेत्रीय शिक्षा अधिकारी नियमित निरीक्षण नहीं कर रहे हैं, यह भी रिपोर्ट में सामने आया। करीब 45 फीसदी स्कूलों में वन नेशन, ग्रेट नेशन कार्यक्रम का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो रहा है। हालांकि, मध्याह्न भोजन और पुस्तकालय सुविधाएं अपेक्षाकृत बेहतर पाई गईं।