पहले 1400 में मिलने वाली खाद की बोरी हुई 1850 रुपये की
-गेहूं सीजन में 450 रुपये की बढ़ोतरी, लागत बढ़ने से खेती छोड़ने को मजबूर हो रहे किसान
संवाद न्यूज एजेंसी
बरठीं (बिलासपुर)। खेती को लाभ का धंधा बनाने के सरकारी दावों के बीच अब हकीकत कुछ और ही है। खाद, बीज और दवाइयों के लगातार बढ़ते दामों ने किसानों की कमर तोड़ दी है। इस बार गेहूं सीजन में खाद की कीमत में 450 रुपये तक की बढ़ोतरी हो गई है, जिससे किसान भारी आर्थिक दबाव में आ गए हैं।
पहले एनपीके 12:32:16 की एक बोरी 1400 रुपये में मिलती थी, जबकि अब किसानों को इसके लिए 1850 रुपये चुकाने पड़ रहे हैं। इससे खेती की लागत में सीधा इजाफा हो गया है। किसानों का कहना है कि बढ़ते दामों के चलते खेती अब घाटे का सौदा बनती जा रही है। किसान बलवीर ठाकुर, हुकुमचंद, सुरेश ठाकुर, सुनील सिंह, धनीराम, सरबजीत सिंह, नानक चंद, वासुदेव ठाकुर, प्रकाश चंद और जगदीश चंद ठाकुर ने बताया कि एक ओर आसमानी मार और दूसरी ओर जमीन की मार ने किसानों की हालत खराब कर दी है। गत वर्ष भी प्राकृतिक आपदा के कारण उनकी फसलें खत्म हो गई थीं, अब खाद के दाम बढ़ने से खेती से मोहभंग होने लगा है। कहा कि जितना खर्च खाद, बीज, दवाई, जुताई और कटाई में आता है, उतनी आमदनी फसल बेचने से नहीं हो पाती। खाद कंपनियों द्वारा मनमाने तरीके से दाम बढ़ाने से प्रति बीघा खेती की लागत भी बढ़ गई है। उन्होंने बताया कि एनपीके खाद (12:32:16) फसल के शुरुआती विकास के लिए जरूरी है, क्योंकि इसमें नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की उचित मात्रा होती है, लेकिन इसके दाम बढ़ने से किसान आर्थिक बोझ के तले दबते जा रहे हैं। कहा कि अगर खाद का प्रयोग कम किया गया तो पैदावार पर सीधा असर पड़ेगा। उन्होंने सरकार से मांग की है कि खाद, बीज और दवाइयों के दामों को नियंत्रित किया जाए ताकि खेती को घाटे से बचाया जा सके। किसानों का कहना है कि पहले से ही आमदनी घट रही है, ऐसे में बढ़ती कीमतें उनके लिए नई मुसीबत लेकर आई हैं।