जिला एवं सत्र न्यायालय बिलासपुर के विशेष न्यायाधीश-2 ने सुनाया आदेश
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। जिला एवं सत्र न्यायालय बिलासपुर के विशेष न्यायाधीश-2 नविश भारद्वाज की अदालत ने घुमारवीं थाना में दर्ज 1.853 किलोग्राम चरस बरामदगी के मामले में एक आरोपी की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि बरामद मादक पदार्थ व्यावसायिक मात्रा का है। ऐसे मामलों में एनडीपीएस अधिनियम की धारा-37 के तहत जमानत के लिए निर्धारित कड़ी शर्तों का पालन अनिवार्य है और प्रथम दृष्टया आरोपी के पक्ष में ऐसा कोई आधार नहीं बनता, जिससे उसे राहत दी जा सके।
अभियोजन पक्ष के अनुसार पांच अप्रैल 2025 की रात को कीरतुपर-नेरचौक फोरलेन की टनल नंबर-4 के समीप पुलिस टीम नाकाबंदी कर वाहनों की जांच कर रही थी। इसी दौरान मंडी की ओर से आ रही एक कार को जांच के लिए रोका गया। तलाशी लेने पर वाहन की अगली सीट के नीचे से चिपकने वाली टेप में लिपटे चार पैकेट बरामद हुए। जांच में इनमें कुल 1.853 किलोग्राम चरस पाई गई। इसके बाद पुलिस ने एनडीपीएस एक्ट की धाराओं 20 और 29 के तहत मामला दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार किया। जमानत याचिका में आरोपी की ओर से दलील दी गई कि गिरफ्तारी के समय उसे लिखित रूप में गिरफ्तारी के आधार (ग्राउंड्स ऑफ अरेस्ट) उपलब्ध नहीं कराए गए, जिससे गिरफ्तारी और उसके बाद की न्यायिक कार्रवाई कानून के अनुरूप नहीं मानी जा सकती। बचाव पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य तथा डॉ. राजिंद्र राजन बनाम भारत संघ मामलों के निर्णयों का हवाला देते हुए जमानत देने का आग्रह किया। वहीं, राज्य सरकार की ओर से जमानत का विरोध करते हुए कहा गया कि मामले में बरामद चरस कमर्शियल मात्रा की है, एफएसएल रिपोर्ट में बरामद पदार्थ के चरस होने की पुष्टि हो चुकी है तथा आरोपी के विरुद्ध अन्य आपराधिक मामले भी दर्ज हैं। ऐसे में उसे जमानत देना जांच और न्यायिक प्रक्रिया के हित में उचित नहीं होगा।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले में लिखित रूप से गिरफ्तारी के आधार उपलब्ध न कराने का तर्क जमानत का आधार नहीं बन सकता। अदालत ने यह भी कहा कि गिरफ्तारी मेमो से स्पष्ट है कि आरोपी को यह बताया गया था कि उसे किस एफआईआर और किन धाराओं के तहत गिरफ्तार किया गया है तथा उसके परिजनों को भी इसकी सूचना दी गई थी। विशेष अदालत ने कहा कि कमर्शियल मात्रा के मामलों में एनडीपीएस एक्ट की धारा-37 के तहत जमानत तभी दी जा सकती है, जब अदालत प्रथम दृष्टया इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि आरोपी दोषी नहीं है और जमानत पर रिहा होने के बाद उसके दोबारा अपराध करने की संभावना नहीं है। इन सभी तथ्यों, एफएसएल रिपोर्ट, बरामदगी की प्रकृति और सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों को ध्यान में रखते हुए विशेष अदालत ने नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी। साथ ही आदेश में कहा गया कि जमानत पर की गई टिप्पणियां केवल इस याचिका के निस्तारण तक सीमित रहेंगी और मुकदमे के अंतिम निर्णय को प्रभावित नहीं करेंगी।