1889 में शिमला के अधीक्षक डब्ल्यू. गोल्डस्टीन ने की थी पहल
बदलते वक्त के साथ बदली मेले की तस्वीर, आधुनिकता ने छीना पुराना स्वरूप
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। ऐतिहासिक राज्य स्तरीय नलवाड़ी मेले को शुरू हुए 136 साल हो गए हैं। इस वर्ष यह 137वें साल में प्रवेश कर गया। इस मेले को 1889 में शिमला अधीक्षक डब्ल्यू. गोल्डस्टीन ने शुरू किया था। मेले को मवेशी व्यापार को बढ़ावा देने के लिए शुरू किया गया था। बदलते वक्त के साथ मेले की तस्वीर भी बदली गई। इसके पुराने स्वरूप की जगह आधुनिकता ने ले ली है। अब न ही यहां पर पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज सुनाई देती है और न ही गंभरी जैसी कलाकार लोगों का मनोरंजन करती हैं।
बिलासपुर में नलवाड़ी मेले का इतिहास बहुत समृद्ध है। मेले की शुरुआत डब्ल्यू. गोल्डस्टीन ने की थी, जो उस समय शिमला की पहाड़ियों के अधीक्षक के रूप में कार्यरत थे। गोल्डस्टीन ने पूरे राज्य में अच्छी गुणवत्ता वाले मवेशियों की अत्यधिक आवश्यकता को देखा, और इसके लिए उन्होंने प्रजनन को प्रोत्साहित करने और क्षेत्र में मवेशियों की संख्या बढ़ाने के साधन के रूप में मेले का आयोजन किया। मेले का मुख्य ध्यान बैलों पर था, जिसकी संख्या लगातार कम होती जा रही थी। गोल्डस्टीन की पहल का उद्देश्य एक ऐसा मंच देना था जहां मवेशियों को खरीदा और बेचा जा सके। इस प्रकार पशुधन के लिए एक संपन्न बाजार को बढ़ावा दिया जा सके। इससे न केवल गुणवत्ता वाले मवेशियों की तत्काल आवश्यकता को पूरा किया, बल्कि एक वार्षिक कार्यक्रम की नींव भी रखी जो बिलासपुर के सांस्कृतिक ताने-बाने में गहराई से समाहित हो गया।
1936 में कहलूर रियासत के अंतिम राजा विजय चंद के बाद राजा आनंद गद्दी पर बैठे। तब से मेले को नलवाड़ी मेले के रूप में मनाया जाने लगा। 1960 के दशक में राजा के आदेशानुसार नलवाड़ी मेला सांडू मैदान में लगता था। पंजाब के रोपड़ और नवांशहर से व्यापारी सामान ऊंटों पर लादकर लाते थे। नलवाड़ी मेले में रोपड़, नालागढ़ और बिलासपुर के ग्रामीण इलाकों से बैल लाए जाते थे। हजारों की संख्या में पशुओं की खरीद-फरोख्त होती थी। सांडू मैदान के गोबिंद सागर झील में डूब जाने के बाद मेले को काफी दूर जाकर नए शहर बिलासपुर के लुहणू मैदान में लगाना पड़ा। शहर के लक्ष्मी नारायण मंदिर से जुलूस की शुरुआत होती है और यह देखने लायक होता है। इसमें स्थानीय लोक नृत्य समूहों, महिलाओं की टोलियां, बच्चों और पौराणिक संस्कृति को दर्शाते पारंपरिक संगीत वाद्ययंत्रों और बैंडों का भव्य प्रदर्शन होता है। फिर बैलों की जोड़ी की पूजा के साथ मेले की शुरुआत होती है, जो एक आकर्षक दृश्य होता है।
बैलों को खुशी, धन और अनाज का प्रतीक माना जाता है। उनकी पूजा श्रद्धा से की जाती है। अब इस मेले में मवेशी कम ही संख्या में पहुंचते हैं। मात्र नाम के लिए ही यहां पशुओं में किस्मों की प्रतियोगिताएं होती हैं।
मेले में होती है सांस्कृतिक संध्याएं
इस मेले में रंगारंग सांस्कृतिक संध्याएं होती हैं। इस दौरान युवक मंडल और महिला मंडल और स्थानीय कलाकार प्रतिभा का प्रदर्शन करते हैं। इस मेले में स्व. गंभरी देवी, रोशनी देवी और संतराम चब्बा जैसे प्रसिद्ध लोक कलाकार भी प्रस्तुतियां देते थे। उनके कार्यक्रम इतने लोकप्रिय थे कि दूर-दूर से लोग उन्हें सुनने के लिए आते थे। अब इस मेले में वो रौनक नहीं दिखाई देती है।
कुश्ती आकर्षण का केंद्रइस मेले का अभिन्न अंग कुश्ती है, जो स्थानीय एथलीटों को कौशल और शारीरिक कौशल का प्रदर्शन करने के लिए मंच देता है। इसके अतिरिक्त मेले में विभागों की प्रदर्शनियां, खेल प्रतियोगिताएं और अन्य आकर्षक गतिविधियां भी शामिल हैं, जो इसकी लोकप्रियता और आकर्षण में योगदान देते हैं।
पर्यटकों का करता है आकर्षित
नलवाड़ी मेले में पर्यटन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह देश, विदेश से आगंतुकों को आकर्षित करता है। मेले के दौरान आगंतुकों को आकर्षित करने के लिए कुश्ती, पैराग्लाइडिंग जैसी कई तरह की खेल और साहसिक गतिविधियां होती हैं।