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Bilaspur News: कीरतपुर-नेरचौक फोरलेन पर वन भूमि की सुरक्षा में बड़ी चूक

Fri, 30 Jan 2026 11:29 PM IST
शिमला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
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वन भूमि डायवर्जन की शर्त संख्या-18 का उल्लंघन, कार्रवाई न होने पर कानूनी कदम उठाने की चेतावनी
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वन विभाग ने एनएचएआई को जारी की अंतिम चेतावनी
गायब व क्षतिग्रस्त बाउंड्री पिलरों की तुरंत मरम्मत व दोबारा स्थापना के आदेश
2013 में होना था वन भूमि का सीमांकन, 12 साल बाद भी अधूरा
एनएच पर गायब और क्षतिग्रस्त पिलरों से अतिक्रमण का खतरा
सत्यापन समिति की रिपोर्ट में एनएचएआई की गैर-अनुपालना उजागर


संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। कीरतपुर–नेरचौक राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण के दौरान परिवर्तित की गई वन भूमि की सुरक्षा को लेकर वन विभाग और एनएचएआई के बीच लंबे समय से चला आ रहा विवाद अब गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। वन वृत बिलासपुर के अरण्यपाल ने एनएचएआई पीआईयू मंडी के परियोजना निदेशक को कड़े शब्दों में निर्देश जारी करते हुए सड़क के दोनों ओर स्थापित किए जाने वाले आरओडब्ल्यू आरसीसी बाउंड्री पिलरों की मरम्मत व दोबारा स्थापना तुरंत प्रभाव से करने को कहा है।
अरण्यपाल ने पत्र जारी कर स्पष्ट किया है कि यह कार्य प्राथमिकता के आधार पर बिना किसी और देरी के पूरा किया जाए और इसकी विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट तत्काल वन वृत बिलासपुर तथा डीसीएफ बिलासपुर वन मंडल को प्रस्तुत की जाए। उल्लेख किया है कि उप वन संरक्षक (डीसीएफ), बिलासपुर वन मंडल ने अपने कार्यालय के पत्र के माध्यम से यह रिपोर्ट दी थी कि एनएचएआई की ओर से लगातार लापरवाही बरती जा रही है। बार-बार पत्राचार, अनुस्मारक और व्यक्तिगत संपर्क के बावजूद न तो गायब बाउंड्री पिलरों को दोबारा लगाया गया और न ही क्षतिग्रस्त पिलरों की मरम्मत की गई। वन विभाग ने इस मुद्दे पर पहले भी कई स्तरों पर प्रयास किए। स्थिति की वास्तविकता जानने के लिए सत्यापन समिति का गठन किया गया, जिसने मौके का निरीक्षण कर अपनी रिपोर्ट सौंपी। समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से निर्देशों की गैर-अनुपालना की पुष्टि की है। वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार कीरतपुर–नेरचौक सड़क परियोजना के लिए जो वन भूमि परिवर्तित की गई थी, उसका सीमांकन वर्ष 2013 में ही पूरा किया जाना था। नियमानुसार सड़क के दोनों ओर आरसीसी बाउंड्री पिलर लगाकर वन भूमि की स्पष्ट पहचान सुनिश्चित की जानी थी, ताकि भविष्य में किसी प्रकार का अतिक्रमण न हो।
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हालांकि 12 वर्ष बीत जाने के बाद भी यह कार्य अधूरा पड़ा है। पिलरों की अनुपस्थिति और क्षति के चलते कई स्थानों पर वन भूमि और गैर-वन भूमि की सीमा स्पष्ट नहीं है, जिससे अतिक्रमण की आशंका लगातार बढ़ती जा रही है। वन विभाग ने अपनी रिपोर्ट में चेताया है कि यदि जल्द सीमांकन नहीं किया गया तो परिवर्तित वन भूमि पर अवैध कब्जे, कटान और अन्य गतिविधियों का खतरा और बढ़ जाएगा। इससे न केवल वन संपदा को नुकसान पहुंचेगा, बल्कि भविष्य में कानूनी और पर्यावरणीय जटिलताएं भी उत्पन्न होंगी। यह स्थिति पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की ओर से हाईवे के लिए दी गई वन भूमि डायवर्जन की अंतिम स्वीकृति की शर्त संख्या-18 का सीधा उल्लंघन मानी जा रही है। उक्त शर्त के तहत परियोजना एजेंसी पर यह जिम्मेदारी तय की गई थी कि वह परिवर्तित वन भूमि की स्पष्ट सीमांकन व्यवस्था सुनिश्चित करेगी।

कानूनी कार्रवाई की अंतिम चेतावनी

अरण्यपाल ने परियोजना निदेशक मंडी को स्पष्ट रूप से आगाह किया है कि यदि अब भी निर्देशों का पालन नहीं किया गया तो वन विभाग कानून के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत उचित कार्रवाई शुरू करने को विवश होगा। इसमें पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, वन संरक्षण अधिनियम तथा अन्य वैधानिक प्रावधानों के तहत कार्रवाई शामिल हो सकती है। मेमो में यह भी रेखांकित किया गया है कि यह मामला अत्यंत आवश्यक और संवेदनशील है तथा इसके समाधान के लिए परियोजना निदेशक का व्यक्तिगत हस्तक्षेप और निगरानी अनिवार्य है।
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उच्चाधिकारियों को भी भेजी गई प्रतिलिपि
इस संबंध में जारी आदेश की प्रतिलिपि नोडल अधिकारी-सह-एपीसीसीएफ (एफसीए), प्रधान मुख्य वन संरक्षक कार्यालय शिमला और डीएफओ बिलासपुर को भी सूचना एवं आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजी गई है, ताकि मामले की निगरानी उच्च स्तर पर भी की जा सके।
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