कल्याण कला मंच की गोष्ठी में रचनाओं ने बांधा समां, साहित्यकार सम्मानित
बेरोजगारी, नशे और पर्यावरण संरक्षण से लेकर रिश्तों और जीवन की संवेदनाओं की पढ़ीं रचनाएं
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। कल्याण कला मंच बिलासपुर की मासिक साहित्यिक गोष्ठी काले बाबा की नगर कुटिया, हनुमान टिल्ला में हुई। बिलासपुर की सेवानिवृत्त खंड प्राथमिक शिक्षा अधिकारी रूमा चंदेल ने बतौर मुख्यातिथि शिरकत की। सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य रमेश शर्मा के निधन पर दो मिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।
रूमा चंदेल को काले बाबा शिक्षा स्काउट सम्मान-2026 और वरिष्ठ सदस्य डॉ. अनेक राम सांख्यान को काले बाबा सतत लेखन सम्मान-2026 से सम्मानित किया गया। मुख्यातिथि ने आयोजन के लिए 2100 रुपये की आर्थिक सहायता भी दी।
गोष्ठी में नीरज शर्मा ने तुम तो भगवान थे राम, फिर क्यों इस हाल छोड़ चले गए, अनिल शर्मा नील ने महज लंच बॉक्स नहीं, न पानी की बोतल, जिम्मेदारियों से लदा रहता है यह बैग और चैन सिंह ने क्या बेरोजगार आज दर-दर की ठोकरें नहीं खाता है, क्या कोई बच्चा, कोई बूढ़ा अब भूखा नहीं सोता है रचनाएं प्रस्तुत कर खूब वाहवाही लूटी।
बृज लाल लखनपाल ने किसगे दुखड़ा अपणा सुणाऊं, अखिया रे अंजू कियां दिखाऊं, जांदी जांदी चली गई, वीना वर्धन ने सेओ नी आए मेले एबकी बारी, कर्मवीर कंडेरा ने एक डोली चली, एक अर्थी चली, डोली अर्थी से कहने लगी और सुशील पुंडीर ने सूखा पेड़ हूं, हरा भरा था कभी, आज सूखा हूं, अपने उद्गार की प्रतीक्षारत खड़ा हूं सुनाई।
अमरनाथ धीमान ने भटक-भटक कर जब जग में मैं थक कर हार गया, तब हाथ पकड़कर मेरा बाबा तूने मुझे संभाल लिया, रेखा चंदेल ने ए माता जी जनकपुरी ब्याणे जाणा सीता ब्याह के लयाणी और हुसैन अली ने था मैं नींद में और मुझे सजाया जा रहा था, बड़े प्यार से मुझे नहलाया जा रहा था प्रस्तुत कर तालियां बटोरीं। चौथी के छात्र माधव ने आंगन में इक पेड़ लगाएं सुनाकर पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया।
रवींद्र शर्मा ने मेरी नजरों ने देखा दूर का इक नजारा, शिव सहगल ने जिंदगी का सफर, ये कैसा सफर और जय महवाल ने शर्मो शर्मिए फेरी उठणे पऊंदा ए चक्कर आ प्रस्तुत की। अरुण डोगरा रीतू ने मैं खामोश रहूं तो कहते हैं कुछ तो गड़बड़ है और रामपाल डोगरा ने जो आया है वो जाएगा, अच्छे कर्म करिए सुनाया।
सुमन चड्ढा ने भूखे को रोटी मिले, प्यासे को नीर, रोहित डोगरा ने वो ठंडी हवाएं, वो सुकून भरी शामें, बस दिल के कोने में रह जाएंगी यादें, रविंद्र कमल चंदेल ने फिर लौट चल उस युग में जहां धरा को मां है पुकारते, जगदीश सहोता ने हे पितरो, जहां भी हो हम पर कृपा बनाए रखना और जीत राम सुमन ने बुजुर्गों की छड़ियों की वो ठक-ठक, वह हजारों अनुभवों की आवाज थी प्रस्तुत की।
सुरेंद्र मिन्हास ने कदी अली खड्डा न्हाणे जांदे और डॉ. अनेक राम सांख्यान ने छड्डी देया नशा चिट्टे दा प्रस्तुत कर सामाजिक सरोकारों को सामने रखा। मुख्यातिथि रूमा चंदेल ने कल्याण कला मंच की साहित्यिक गतिविधियों और प्रयासों की सराहना की।