मंत्री धर्माणी बोले- प्रदेश के संसाधनों और अधिकारों को वापस लेने की दिशा में काम कर रही सरकार
पिछली सरकार ने एक रुपये के नाममात्र शुल्क पर दी गई थी जमीन, वर्षों बाद भी नहीं हुआ औद्योगिक विकास
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। हिमाचल प्रदेश सरकार बिलासपुर के गरामोड़ स्थित प्रवेश द्वार पर करीब सवा 500 बीघा जमीन वापस लेगी। इस जमीन पर बड़े स्तर पर व्यावसायिक गतिविधियां विकसित की जाएंगी। पूर्व सरकार ने यह जमीन एक रुपये के नाममात्र शुल्क पर दी थी। वर्षों बाद भी वहां अपेक्षित औद्योगिक विकास नहीं हो सका। अब प्रदेश सरकार इसका आवंटन निरस्त कर इसे अपने अधीन लेने की प्रक्रिया में है। इसका उपयोग प्रदेश और बिलासपुर के हित में किया जाएगा।
बिलासपुर परिधि गृह में आयोजित प्रेस वार्ता में धर्माणी ने कहा कि उन्होंने उपायुक्त को इस संबंध में विस्तृत मामला तैयार कर सरकार को भेजने के निर्देश दिए थे। जिला प्रशासन ने यह केस सरकार को भेज दिया है। संबंधित पक्ष न्यायालय पहुंचा है, लेकिन सरकार मजबूती से अपना पक्ष रख रही है। यह सरकारी भूमि है और इस पर वन संरक्षण अधिनियम की बाध्यता भी नहीं है। इससे विकास कार्य तेजी से किए जा सकेंगे। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली सरकार हिमाचल के अधिकारों और संसाधनों को वापस लेने की दिशा में काम कर रही है। सरकार ने अपने कार्यकाल में कई ऐसे फैसले लिए हैं। इनसे प्रदेश को सैकड़ों करोड़ रुपये का लाभ मिला है। आने वाले समय में हजारों करोड़ रुपये का आर्थिक फायदा होगा। सरकार ने वाइल्ड फ्लावर हॉल की मालिकाना हक की लड़ाई जीती है। यह प्रदेश की आय का मजबूत स्रोत बना है। वर्तमान में इससे करीब दो करोड़ रुपये प्रतिमाह की आय हो रही है। अब तक लगभग 400 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हो चुका है। राज्य सरकार ने जलविद्युत नीति में बदलाव कर प्रदेश के हितों को प्राथमिकता दी। इस फैसले को अदालत में चुनौती दी गई थी। सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार के पक्ष में निर्णय दिया। इसके बाद जेएसडब्ल्यू से जुड़े एक प्रोजेक्ट से प्रदेश को प्रतिवर्ष लगभग 150 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय मिलने लगी है।
धर्माणी ने बताया कि किशाऊ बांध परियोजना पर भी सरकार ने प्रदेश हित में सख्त रुख अपनाया है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि परियोजना से पेयजल का लाभ दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा जैसे राज्यों को मिलेगा। इसलिए निर्माण लागत भी वही राज्य वहन करें। हिमाचल को केवल बिजली परियोजना का लाभ मिलना चाहिए। इस निर्णय से भविष्य में प्रदेश को लगभग 600 करोड़ रुपये का लाभ होगा। 100 मेगावाट की परियोजना का फायदा भी मिलेगा। केंद्र सरकार से केवल 30 करोड़ रुपये मिलने थे। इसके बदले प्रदेश की लगभग 1500 बीघा मूल्यवान भूमि चली जाती। सरकार ने 30 करोड़ रुपये वापस कर दिए हैं। अब अपने स्तर पर उस क्षेत्र का विकास कर उद्योग स्थापित करेगी। इससे प्रदेश को भूमि का उचित मूल्य मिलेगा और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे।
सरकार अभी भी कई महत्वपूर्ण मामलों पर लड़ाई लड़ रही है। बीबीएमबी में हिमाचल के अधिकार, शानन पावर प्रोजेक्ट की वापसी और चंडीगढ़ में प्रदेश की 7.19 फीसदी हिस्सेदारी जैसे मुद्दों पर सरकार लगातार प्रयास कर रही है। सर्वोच्च न्यायालय से कई मामलों में प्रदेश के पक्ष में फैसले आए हैं। शेष मामलों में भी सरकार मजबूती से पैरवी कर रही है। पिछली सरकार के समय कई जलविद्युत परियोजनाएं केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों को ऐसी शर्तों पर सौंप दी गईं। इनमें हिमाचल को न रॉयल्टी मिली और न ही इक्विटी। वर्तमान सरकार ऐसे सभी फैसलों की समीक्षा कर रही है। जहां भी प्रदेश के हित प्रभावित हुए हैं, वहां उन्हें वापस लेने की कार्रवाई की जाएगी। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने हर मंच पर प्रदेश के हितों को सर्वोपरि रखा है। सरकार भविष्य में भी प्रदेश के संसाधनों और अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखेगी।