श्री नयना देवी जी में माथा टेककर वापस लौट जाते हैं बाहरी राज्यों के श्रद्धालु
ऋषि मार्कंडेय, बाबा नाहर सिंह धौलरा मंदिर जैसे पवित्र स्थल तक न के बराबर है पहुंच
अनिल ठाकुर
बिलासपुर। प्रदेश का बिलासपुर जिला धार्मिक दृष्टि से बेहद समृद्ध क्षेत्र है। यहां का हर कोना आस्था और संस्कृति की विरासत से जुड़ा हुआ है। बावजूद इसके, धार्मिक पर्यटन के क्षेत्र में यह जिला अपनी वास्तविक पहचान नहीं बना पाया है। प्रदेश ही नहीं, बल्कि देशभर में प्रसिद्ध श्री नयना देवी शक्तिपीठ हर वर्ष लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है, लेकिन खेद की बात यह है कि अधिकतर श्रद्धालु मंदिर में माथा टेककर सीधे वापस लौट जाते हैं।
जिले के अन्य धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों तक श्रद्धालुओं को पहुंचाने की दिशा में अभी तक कोई ठोस प्रयास नहीं किए गए हैं। जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूरी पर स्थित उत्तरी भारत के सुप्रसिद्ध महर्षि मार्कंडेय मंदिर प्रदेश के प्राचीनतम धार्मिक स्थलों में से एक है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, चार धाम की यात्रा करने वाला व्यक्ति जब तक मार्कंडेय तीर्थ में स्नान नहीं करता, तब तक उसकी यात्रा अधूरी मानी जाती है। इसी कारण से हर वर्ष वैशाखी पर्व पर यहां विशाल धार्मिक मेला आयोजित होता है, जिसमें प्रदेश के अलावा पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश से भी हजारों श्रद्धालु स्नान और दर्शन के लिए पहुंचते हैं। लेकिन यह सिर्फ वैशाखी पर ही वहां पहुंच पाते हैं। आम दिनों में माथा टेकने के लिए यहां पर अभी तक श्रद्धालुओं का जुड़ाव नहीं बन सका है। प्रदेश सरकार ने कुछ वर्ष पूर्व इस मंदिर को अपने अधीन लेकर यहां विकास कार्य भी करवाए हैं। मंदिर परिसर में सीढ़ीनुमा स्नान घर, श्रद्धालुओं के लिए विश्राम गृह और पार्किंग की व्यवस्था की गई है। फिर भी इस स्थल को राष्ट्रीय धार्मिक पर्यटन सर्किट से जोड़ने के लिए कोई बड़ी पहल नहीं हो पाई है।
पर्यटन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बिलासपुर जिले के धार्मिक स्थलों को श्रद्धा परिक्रमा सर्किट के रूप में जोड़ा जाए, तो यह क्षेत्र उत्तर भारत के प्रमुख धार्मिक पर्यटन केंद्रों में शुमार हो सकता है। धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक वैभव और सांस्कृतिक धरोहर से परिपूर्ण बिलासपुर जिला, हिमाचल का वह क्षेत्र है जहां श्रद्धा और संभावनाएं दोनों हैं, लेकिन योजना और समन्वय की कमी से यह अपनी पहचान नहीं बना पाया है। यदि सरकार और प्रशासन मिलकर नयना देवी, ऋषि मार्कंडेय, बाबा नाहर सिंह और अन्य धार्मिक स्थलों को एक सर्किट में जोड़ दें, तो आने वाले वर्षों में बिलासपुर हिमाचल का नहीं बल्कि उत्तर भारत का प्रमुख धार्मिक पर्यटन केंद्र बन सकता है।
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बाबा नाहर सिंह धौलरा मंदिर कहलूर रियासत की ऐतिहासिक धरोहर
बिलासपुर बस स्टैंड से कुछ दूरी पर स्थित बाबा नाहर सिंह मंदिर धौलरा न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि ऐतिहासिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। मान्यता है कि बाबा नाहर सिंह कहलूर रियासत के महाप्रतापी राजा दीपचंद की रानी कुंकुम देवी के साथ कुल्लू से आए थे। राजा दीपचंद (1653 ई. से 1665 ई.) ने अपने महल के समीप ही बाबा नाहर सिंह का मंदिर बनवाया था। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, बाबा नाहर सिंह बिलासपुर जनपद के आराध्य देव हैं, जिन्हें श्रद्धालु वीर व बजिया के रूप में पूजते हैं। धार्मिक ग्रंथों में वर्णित 52 वीरों में से एक माने जाने वाले बाबा नाहर सिंह के मंदिर में हर वर्ष ज्येष्ठ महीने के प्रत्येक मंगलवार को मेला लगता है। हजारों श्रद्धालु माथा टेकने और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए दूर-दूर से पहुंचते हैं।
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अन्य आस्था स्थल भी हैं आकर्षण का केंद्र
जिले में श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर, रुक्मिणी कुंड भी धार्मिक दृष्टि से अत्यंत पूजनीय स्थल हैं। इन स्थलों का धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व प्रदेश की पहचान का हिस्सा है। लेकिन इन सभी स्थानों तक पहुंचने के लिए पर्याप्त मार्ग सुविधा, संकेतक बोर्ड, स्वच्छता और ठहरने की व्यवस्था की कमी आज भी महसूस की जाती है।
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स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलेगा बल
धार्मिक पर्यटन के विस्तार से बिलासपुर की स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिल सकती है। होटल, लॉज, परिवहन सेवाओं, स्थानीय हस्तशिल्प, प्रसाद सामग्री और पारंपरिक उत्पादों की बिक्री में वृद्धि से सरकार के राजस्व में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी संभव है। इसके अलावा, धार्मिक आयोजनों और मेलों से जिले की सांस्कृतिक पहचान भी राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत होगी।
संवाद
रूक्मणी कुंड।
रूक्मणी कुंड।