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Bilaspur News: सरयून खास में नया पटवार खाना खोलने की दोबारा उठने लगी मांग

Fri, 19 Dec 2025 11:28 PM IST
शिमला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
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जनसंख्या 1500, सात पलंगरियां, 18 किमी दूर जाकर कराने पड़ते हैं राजस्व कार्य
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पटवारखाना तक पहुंचने के लिए ग्रामीणों को नहीं है सीधी बस सुविधा उपलब्ध

संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। सरयून खास क्षेत्र में नया पटवार खाना खोलने की वर्षों पुरानी मांग एक बार फिर जोर पकड़ने लगी है। सरयून खास क्षेत्र की सात पलंगरियों की कुल आबादी करीब 1500 है, लेकिन भूमि से जुड़े छोटे-छोटे कार्यों के लिए भी लोगों को 17–18 किलोमीटर दूर कुह मझवाड़ जाना पड़ता है।
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पूर्व सैनिक राजेश ठाकुर ने बताया कि नकल, जमाबंदी, ततिमा जैसे राजस्व कार्यों के लिए कुह मझवाड़ के अलावा कोई विकल्प नहीं है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि वहां तक पहुंचने के लिए सीधी बस सुविधा उपलब्ध नहीं है। लोगों को हरलोग या त्रिफलघाट मार्ग से होकर जाना पड़ता है, जहां परिवहन व्यवस्था बेहद सीमित है। ऐसे में ग्रामीणों को टैक्सी का सहारा लेना पड़ता है, जिस पर एक बार में ही 1000 से 1200 रुपये तक खर्च हो जाते हैं। पहले लोग जंगल के रास्तों से किसी तरह कुह मझवाड़ पहुंच जाते थे, लेकिन अब जंगल घने हो चुके हैं और जंगली जानवरों का खतरा काफी बढ़ गया है। ऐसे में अकेले जाना जोखिम भरा हो गया है। इसका सबसे ज्यादा असर महिलाओं, बुजुर्गों और बीमार लोगों पर पड़ रहा है। मांग की है कि यदि सरयून खास (सात पलंगरियां) और चलेहली क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले जमथलीघाट, मडोना, घरवासड़ा, रेहडा, ठंकरा, म्यून, रेहग, दरोला, भंगलेरा सहित आसपास की छोटी पलंगरियों व जंगल क्षेत्रों को मिलाकर किसी केंद्रीय स्थान पर नया पटवार खाना खोला जाए, तो हजारों ग्रामीणों को सीधा लाभ मिलेगा। बताया कि इस संबंध में जिला राजस्व अधिकारी,उपायुक्त बिलासपुर,सदर क्षेत्र के पूर्व विधायक बंबर ठाकुर, राजस्व मंत्री और मुख्यमंत्री को ई-मेल के माध्यम से मांग पत्र भेजा गया है। साथ ही अंतरिम व्यवस्था के तौर पर सप्ताह में कम से कम एक दिन पटवारी को सरयून गांव में बैठकर काम करने की अनुमति देने की मांग भी की गई है। पूर्व सैनिक ने यह भी बताया कि सरयून खास और चलेहली गांवों की भौगोलिक स्थिति जटिल है। ये गांव कई छोटी बसावटों और पलंगरियों से मिलकर बने हैं, जिनका आज तक विधिवत बंदोबस्त नहीं हो पाया है। उन्होंने मांग की कि इन सभी बसावटों को अलग-अलग नाम और पहचान देकर राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए, ताकि सरकारी योजनाओं और पत्राचार में ग्रामीणों को परेशानी न हो।
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