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Bilaspur News: पांच से आठ नवंबर तक मनाया जाएगा छठ पर्व

Sat, 02 Nov 2024 11:44 PM IST
शिमला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
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पूर्वांचल जन कल्याण समित बद्दी ने तैयारियां कीं शुरू
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नहाय खाय से उगते सूर्य को अर्घ्य देकर समाप्त होगा त्योहार

संवाद न्यूज एजेंसी

बद्दी(सोलन)। कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला महापर्व छठ 5 से 8 नवंबर तक मनाया जाएगा। नहाय खाय से शुरू होने वाला त्योहार उगते सूरज को अर्घ्य देने के साथ समाप्त होगा। पर्व देश में मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के साथ-साथ अब बीबीएन में भी मनाया जाने लगा है। बीबीएन में करीब दो लाख प्रवासी लोग इस पर्व को मनाते हैं। दिवाली समाप्त होने के साथ ही पूर्वांचल के लोग इस पर्व की तैयारी में जुट गए हैं।

इस वर्ष यह पर्व पांच नवंबर को नहाय-खाय से शुरू होगा। जबकि 06 नवंबर को खरना, सात को अस्त होते सूर्य और 08 नवंबर को उगते सूर्य को अर्घ्य देकर समाप्त होगा। यह अपनी भव्यता और एकता के लिए प्रसिद्ध है। यह एक मात्र ऐसा पर्व है जिसमें डूबते सूरज को अर्घ्य दिया जाता है। दूसरे दिन ही उगते सूरज को अर्घ्य देकर इस महापर्व की समाप्ति की जाती है। यह अर्घ्य व्रती महिलाएं नदी, तालाब में कमर तक पानी में जाकर देती हैं और सूर्य देव का स्मरण करती हैं। व्रती महिलाएं, पुरुष और बच्चे छठ के प्रसाद के साथ व्रत का पारण करते हैं। पूर्वांचल जन कल्याण समिति के प्रवक्ता, अध्यक्ष सत्य पांडे, महासचिव पिंटू सिंह ने बताया कि बताया कि छठ पर्व का इतिहास देखें तो, इस पूजा में सूर्य उपासना के साथ छठी मैया का भी आह्वान किया जाता है। यह पर्व भारत का सबसे पुराना त्योहार है। इस पर्व का उल्लेख तो महाभारत में भी मिलता है। अंग नरेश कर्ण सूर्यपुत्र थे और सूर्यभक्त भी थे, प्रतिदिन सूर्य भगवान की उपासना करते हुए कमर तक जल में खड़े होकर अर्घ्य देकर पूजा को संपन्न करते थे। द्रोपदी ने भी पांडव के साथ इस पर्व पर सूर्य भगवान की आराधना की थी।
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इनसेट

कैसे मनाते छठ पर्व

परम हंस द्विवेदी ने बताया कि इस त्योहार की तैयारी कई दिन पूर्व से शुरू हो जाती हैं। सभी के लिए नए कपड़े, विभिन्न प्रकार के फल की खरीदारी, घर में मीठी पूड़ी जिसे स्थानीय भाषा में ठेकुआ भी कहते हैं जो प्रमुख रूप से बनाया जाता है। ठेकुआ को गेहूं के आटे के साथ चीनी या गुड़ का प्रयोग करके बनाते हैं। इस पर्व में सब कुछ नया होता है। इस पूजन में सूप का बहुत ही महत्व है। चूंकि डाला छठ में किसी भी मूर्ति की पूजा नहीं की जाती है। बल्कि सूर्य देवता और छठी मैया का आह्वान किया जाता है। इस पूजा में नदी या तालाब के किनारे मिट्टी की वेदी बना कर इस पर ही पूजन की शुरुआत होती है। बद्दी के सनसिटी मार्ग पर छठ घाट पर धार्मिक कार्यक्रम होगा।
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