घुमारवीं-झंडूता के बीच फंसी सीट पर देर से हुआ फैसला
कांग्रेस अब भी मंथन में, जिला परिषद चुनाव में उम्मीदवारों से ज्यादा रणनीति की चर्चा
भाजपा ने उम्मीदवार उतारकर माहौल बनाया, कांग्रेस अभी संतुलन साधने में जुटी
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। जिला परिषद चुनावों में इस बार भाजपा के लिए सबसे ज्यादा राजनीतिक माथापच्ची जिस सीट को लेकर हुई, वह बड़गांव वार्ड रहा। कई दिनों तक नाम तय न होने के बाद आखिर भाजपा ने सरवण सिंह को मैदान में उतार दिया। लेकिन यह सिर्फ एक उम्मीदवार की घोषणा भर नहीं मानी जा रही, बल्कि इसके पीछे संगठन के भीतर के समीकरण, क्षेत्रीय संतुलन और नेताओं की ताकत का पूरा गणित देखा जा रहा है।
दरअसल, बड़गांव वार्ड भाजपा के लिए इसलिए उलझा हुआ था क्योंकि इसमें घुमारवीं और झंडूता दोनों विधानसभा क्षेत्रों की पंचायतें आती हैं। ऐसे में टिकट किस क्षेत्र से जुड़े चेहरे को मिले, इस पर अंदरखाने लंबी खींचतान चली। दोनों पक्ष अपने-अपने दावे मजबूत बता रहे थे। पार्टी के लिए मुश्किल यह थी कि किसी एक पक्ष को नाराज करना चुनाव से पहले नुकसानदेह साबित हो सकता था। आखिरकार श्रवण सिंह के नाम पर सहमति बनी। राजनीतिक हलकों में इसे पूर्व मंत्री राजेंद्र गर्ग खेमे की बढ़त के तौर पर भी देखा जा रहा है, क्योंकि सरवण सिंह को उनका करीबी माना जाता है। जिला परिषद चुनाव भले ही पार्टी चिह्न पर नहीं हो रहे, लेकिन बिलासपुर में पूरा चुनावी माहौल भाजपा बनाम कांग्रेस की सीधी लड़ाई में बदल चुका है। फर्क सिर्फ इतना है कि भाजपा ने तेजी दिखाई है, जबकि कांग्रेस अभी भी चयन प्रक्रिया में फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। भाजपा समर्थित उम्मीदवार अब लगभग सभी 14 वार्डों में सामने आ चुके हैं। इससे पार्टी ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि संगठन चुनाव के लिए पूरी तरह तैयार है। उधर कांग्रेस अभी सात वार्डों में ही नाम फाइनल कर पाई है। हालांकि पार्टी इसे कमजोरी नहीं बल्कि रणनीति बता रही है। कांग्रेस जिला अध्यक्ष अंजना धीमान का कहना है कि इस बार उम्मीदवार थोपे नहीं जा रहे, बल्कि ब्लॉक कमेटियों के जरिए स्थानीय राय लेकर नाम तय किए जा रहे हैं। लेकिन राजनीतिक जानकारों की नजर में कांग्रेस की यह धीमी प्रक्रिया एक मजबूरी भी है। कई वार्डों में दावेदार ज्यादा हैं और पार्टी किसी भी कीमत पर चुनाव से पहले बगावत नहीं चाहती। जिले की राजनीति को करीब से देखने वाले मानते हैं कि जिला परिषद चुनावों में पार्टी का नाम उतना काम नहीं करता, जितना उम्मीदवार का व्यक्तिगत नेटवर्क और पंचायत स्तर की पकड़। यही वजह है कि दोनों दल इस बार टिकट वितरण में बेहद सतर्क दिखाई दे रहे हैं। कांग्रेस स्थानीय कार्यकर्ताओं को विश्वास में लेने का दावा कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इन चुनावों में सबसे बड़ा खतरा बागियों से रहता है। कई बार अधिकृत उम्मीदवार से ज्यादा नुकसान नाराज कार्यकर्ता पहुंचा देते हैं। यही वजह है कि दोनों दलों की असली परीक्षा अब टिकट घोषणा के बाद शुरू होगी। स्थानीय गुटबंदी, पुराने चुनावी रिश्ते, जातीय समीकरण और पंचायत स्तर की व्यक्तिगत पकड़ परिणामों को प्रभावित कर सकती है।