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Bilaspur News: अवैध खनन, अनदेखी की भेंट चढ़ी भगतपुर की सुनहरी फसल

Wed, 17 Dec 2025 11:30 PM IST
शिमला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
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ग्राउंड रिपोर्ट की फोटोभगतपुर में मरम्मत के अभाव में बंद पड़ी कूहल। संवाद
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सरयाहली खड्ड में अवैध खनन से नौ फीट नीचे चला गया पानी का स्तर
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ग्राउंड रिपोर्ट

सिंचाई व्यवस्था ठप होने से 500 बीघा भूमि पर धान की खेती बंद
सामुदायिक भागीदारी का अभाव और सरकारी पेच से सिंचाई योजना ठप
योजना की मरम्मत के लिए 20 फीसदी अंशदान को जमा करने में विफल रहे ग्रामीण

सरोज पाठक
बिलासपुर। जिले का भगतपुर गांव जो कभी अपनी उपजाऊ भूमि और प्रचुर धान उत्पादन के लिए 'धान का कटोरा' कहा जाता था, मगर आज गंभीर कृषि संकट से जूझ रहा है। क्षेत्र की लगभग 500 बीघा भूमि, जहां कभी सैंकड़ों परिवार धान की खेती से अपनी आजीविका चलाते थे, अब पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रही है। पानी के अभाव में किसानों ने धान की खेती करना बंद कर दिया है। इसका एक बड़ा कारण जहां अवैध खनन से जल स्तर का काफी नीचे गिरना है, वहीं भगतपुर में लोग इस सिंचाई के लिए 20 फीसदी अंशदान को जमा करने में भी विफल रहे।
लगभग 25 वर्ष पहले, मृदा संरक्षण विभाग ने यहां एक बहाव सिंचाई योजना (फ्लो इरिगेशन स्कीम) स्थापित की थी, जो सरयाहली खड्ड से पानी लिफ्ट करती थी। लेकिन खड्ड के सीने को चीरते अवैध खनन और निरंतर होते भूमि कटाव ने खड्ड के स्वरूप को ही बदल दिया। खड्ड का जलस्तर पिछले दो दशकों में 8 से 9 फीट नीचे चला गया है। परिणाम यह हुआ कि सिंचाई के लिए बनाया गया हेड (बांध) अब पानी के वर्तमान स्तर से काफी ऊंचा हो गया है, जिससे कूहलों में पानी चढ़ना नामुमकिन हो गया है। रिपोर्ट के दौरान एक कड़वा सच भी सामने आया कि किसी भी सिंचाई योजना के सफल संचालन के लिए सरकार और जनता के बीच 80:20 का अनुपात तय होता है। यानी 80 फीसदी खर्च सरकार उठाती है और 20 फीसदी रखरखाव का हिस्सा ग्रामीणों की समितियों को देना होता है। भगतपुर में लोग इस 20 फीसदी अंशदान को जमा करने में विफल रहे। आपसी तालमेल की कमी और फंड न होने के कारण कूहलों की समय पर मरम्मत नहीं हो पाई, जिससे करोड़ों की सरकारी संपत्ति और सिंचाई का ढांचा आज मलबे में तब्दील हो रहा है।
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इनसेट
लागत ज्यादा, मुनाफा न के बराबर
धान की खेती से किसानों के मोह भंग के पीछे केवल पानी की कमी नहीं, बल्कि बदलती अर्थव्यवस्था भी है। धान की रोपाई, निराई और फिर कटाई के बाद उसे झाड़ने की प्रक्रिया पूरी तरह मैनुअल है। आज के समय में लेबर इतनी महंगी हो चुकी है कि धान की कुल पैदावार की कीमत उसकी लागत को भी पूरा नहीं कर पाती। जिले में उपयुक्त मंडियों की दूरी और वहां तक फसल पहुंचाने का भारी परिवहन खर्च भी किसानों की कमर तोड़ रहा है। यही कारण है कि अब किसानों ने धान का विकल्प खोजते हुए सोयाबीन की ओर रुख किया है, जिसमें पानी और मेहनत दोनों कम लगती है।
इनसेट
युवाओं का पलायन बुजुर्गों के कंधों पर पुश्तैनी साख
गांव के जन सांख्यिकीय आंकड़े चौंकाने वाले हैं। 20 से 35 वर्ष की उम्र के मात्र 5 फीसदी युवा ही खेती से जुड़े हैं। शेष युवा रोजगार की तलाश में बद्दी, नालागढ़ जैसे औद्योगिक क्षेत्रों या भारतीय सेना की ओर पलायन कर चुके हैं। पुराने बुजुर्ग आज भी खेती केवल इसलिए कर रहे हैं ताकि उनके खेत खिल्ले (बंजर) न दिखे और समाज में यह संदेश न जाए कि उन्होंने अपनी पुश्तैनी जमीन का मान नहीं रखा।
इनसेट
स्वरोजगार का नया मॉडल : इंजीनियरिंग छोड़ डेयरी की ओर युवा
भले ही पारंपरिक खेती पिछड़ रही हो, लेकिन यहां के किसानों ने हार नहीं मानी है। भगतपुर में डेयरी फार्मिंग एक बड़े क्रांतिकारी बदलाव के रूप में उभरी है। गांव के पढ़े-लिखे युवा और इंजीनियर तक अब डेयरी चला रहे हैं। यहां प्रतिदिन डेढ़-डेढ़ क्विंटल दूध का उत्पादन हो रहा है, जो यह दर्शाता है कि अगर सही दिशा मिले तो युवा स्वरोजगार के प्रति गंभीर हैं।
इनसेट
भविष्य की उम्मीद : जाइका परियोजना
वर्तमान में जहां कुछ समर्थ किसानों ने निजी तौर पर ट्यूबवेल लगाकर अपनी फसलें बचाई हैं, वहीं आम किसान की नजरें अब जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (जायका) के आगामी प्रोजेक्ट पर टिकी हैं। सरकार इस क्षेत्र में जायका के माध्यम से बड़ी सिंचाई योजनाएं लाने की तैयारी में है। ग्रामीणों की मांग है कि अवैध खनन पर सख्ती से लगाम लगाई जाए और सिंचाई कूहलों को दुरुस्त कर इस भूमि को फिर से हरा सोना उगाने के काबिल बनाया जाए।
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कोट
भगतपुर का संकट केवल एक गांव की कहानी नहीं है, बल्कि यह संसाधनों के अंधाधुंध दोहन और सामुदायिक जिम्मेदारी की कमी का नतीजा है। यदि अब भी सुधार की दिशा में कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों के पास केवल बंजर जमीन के टुकड़े ही शेष रहेंगे। जो युवा जमीन छोड़ बाहरी जिलों या राज्यों से 10 से 15 हजार की नौकरी के लिए भटक रहे हैं, उन्हें जमीन और खेती की अहमियत समझनी होगी। इससे उनकी आमदनी भी सुदृढ़ होगी और खेती को भी बढ़ावा मिलेगा।
मानेंद्र सिंह चंदेल, झंडूता ब्लॉक चेयरमैन, आतमा परियोजना

संवाद
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