शाहतलाई (बिलासपुर)। मां रत्नो से किए वायदे को निभाने आज भी बाबा बालक नाथ चैत्र में एक महीने के लिए तलाई आते हैं। मान्यता है कि यहां बाबा ने 12 साल तक शाहतलाई में रत्नो की गाएं चराईं थी, लेकिन एक बार बाबा तपस्या में मग्न थे। इसी दौरान गाएं किसानों की फसल चट कर गईं।
किसानों ने रत्नो से इसकी शिकायत की। किसानों की बातों में आकर मां रत्नो ने बाबा बालक नाथ को भला बुरा कहा। यहां तक कि उन्हें रोटियां-लस्सी(छाछ) का ताना भी दे दिया। बातों को शांत स्वभाव से सुनने के बाद बाबा ने वट वृक्ष के खोल में रखी 12 वर्षों में एकत्रित हुई रोटियों के साथ ही पास में चिमटा मार कर छाछ से भरा तालाब उन्हें दिखा दिया। तब जाकर रत्नो को बाबा बालक नाथ के दिव्य पुरुष होने का अहसास हुआ। उन्होंने बाबा से क्षमा याचना भी की, लेकिन शिव आदेशानुसार बाबा उस स्थान को त्याग कर धौलगिरी पर्वत की ऊंची चोटी पर स्थित गुफा में मोर की सवारी करते हुए चले गए। जो दियोटसिद्ध गुफा के नाम से एक धार्मिक स्थल के रूप में विश्वविख्यात है। इस कारण यहां से जाती दफा मां रत्नो से वायदा किया कि वे हर साल चैत्र माह में शाहतलाई आएंगे। बहरहाल मां रत्नो से किए वायदे के आधार पर चैत्र माह मे शाहतलाई मे मेले का आयोजन किया जाता है।
मंदिर के वरिष्ठ पुजारी पंडित कमल देव शास्त्री ने बताया कि मान्यताओं के अनुसार बाबा बालक नाथ गुजरात के जूनागढ से पिछले जन्म में शिव भगवान के दर्शनों के लिए कैलाश पर्वत पर जाती बार माई रत्नो के पास 12 घड़ियां बिताने के बावत शिव भगवान के आशीर्वाद से 12 वर्ष गाएं चरा कर सेवा करने के लिए शाहतलाई आए थे। यहां वे मां रत्नो की गाएं चराते थे। इसके एवज में उन्हें रोटियां और छाछ(लस्सी) मिलती थी। गाएं घास चरती रहती थी, जबकि बाबा बालक नाथ वट वृक्ष के नीचे बैठकर भक्ति मे लीन रहते थे।
मान्यता है कि चैत्र माह के दौरान बाबा के दरबार में हाजिरी लगाकर रोट-प्रसाद चढ़ाने वाले भक्तों की मनोकामना अवश्य पूरी होती है। पूर्व में अधिकांश श्रद्धालु यहां 8-10 दिन तक डेरा जमाए रहते थे। भजन कीर्तन करते हुए वे मंदिरों मे सुबह शाम की आरतियों में भी भाग लेते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं रहा। अब दर्शन करके वापस अपने घरों को चले जाते हैं।