वीरवार को पहले दिन वाद्ययंत्रों की धुनों पर नाचते-गाते देवलू देवताओं के साथ महायज्ञ में शरीक होने पहुंचे। तलवारों और डंडों के साथ नाचते हुए खूंद (देवलू) देवताओं की पालकी के साथ-साथ चले। देवता बकरालू महाराज के इतिहास में पहली बार चार दशक में महायज्ञ का आयोजन किया जा रहा है। इससे पहले भूंडा महायज्ञ का आयोजन 70 से 80 साल के अंतराल में होता रहा है। दलगांव में देवता के मंदिर में सुबह से ही आम लोगों की आवाजाही शुरू हुई। दोपहर बाद खूंदों के पहुंचने पर कार्यक्रम शुरू हुआ। पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार सबसे पहले रंटाड़ी गांव के देवता मोहरिश अपने देवलुओं के साथ के दलगांव पहुंचे। उसके बाद समरकोट के पुजारली गांव से देवता महेश्वर और बछूंछ गांव से बौंद्रा देवता महायज्ञ के लिए देवता बकरालू के मंदिर पहुंचे।
देवताओं के जयकारों से गूंजा दलगांव
भूंडा महायज्ञ के लिए अपने देवताओं के साथ पहुंचे हर व्यक्ति के हाथ में डंडे, तलवारें समेत अन्य हथियार लहरा रहे थे। हर कदम पर पटाखे फोड़े गए। अपने-अपने देवताओं के जयकारों के साथ खूंद पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य करते हुए देवता बकरालू महाराज के मंदिर पहुंचे। उसके बाद अपनी-अपनी जगहों की ओर रवाना हुए। बाहर देवताओं और देवलुओं के लिए तंबू लगाए गए हैं, जहां पर वे महायज्ञ खत्म होने तक रुकेंगे। देवताओं का मिलन विशेष आकर्षण रहा। लोगों ने देव मिलन का अभिवादन जयकारे के साथ किया।