यमुनानगर। आज बुद्ध पूर्णिमा है। यमुनानगर जिले के लिए खास इसलिए कि यह क्षेत्र कभी बौद्ध धर्म के अनुयायियों की नगरी रहा है। जिसके साक्ष्य आज भी मौजूद हैं। वहीं भगवान बुद्ध का भी इस जिले में आगमन हुआ था। इसलिए ये क्षेत्र बौद्ध अनुयायियों के लिए बहुत अहम हैं।
यहां उनसे जुड़े कई ऐतिहासिक स्थल हैं, जिसकी खोज आज भी हरियाणा पुरातत्व विभाग कर रहा है। अगर यहां टोपरा कलां, चनेटी और सुघ मुख्य बौद्ध स्थल हैं, जहां हेरिटेज वॉक (पुरातत्व पदयात्रा) शुरू करने की तैयारी है। इस तरह का कार्य यहां पहली बार होगा। इसी पदयात्रा के संदर्भ में आज चनेटी में एक अहम बैठक भी है। जिसमें दूसरे राज्यों के बौद्ध धर्म से जुड़े लोग शामिल रहेंगे।
उल्लेखनीय है कि मलएशिया के अवेकनिंग हरमिटेज मंदिर केदाह के मुख्य बौद्ध भिक्षु सेक कायली महाथेरो ने पिछले दिनों अपने 37 सदस्यों के प्रतिनिधिमंडल के साथ टोपरा कलां व चनेटी का भ्रमण किया था। लौटने के बाद सेक कायली महाथेरो ने तत्कालीन मुख्यमंत्री रहे मनोहर लाल व केंद्रीय वन एवं पर्यटन मंत्री कंवरपाल को ईमेल के जरिए पत्र लिखकर यहां की बौद्ध विरासत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने की वकालत की थी।
उन्होंने पत्र में लिखा था भगवान बुद्ध ने यहां भ्रमण के दौरान कई गहन शिक्षाएं दी थीं। ऐसे में यहां तीर्थयात्रा करना उनके लिए आदर्श है। यदि इस पर आधारित सांस्कृतिक उत्सव, प्रचारात्मक लघु फिल्में और बौद्ध देशों के प्रतिष्ठित गुरुओं को आमंत्रित करके इन बुद्ध कारिका स्थलों को एक जीवित विरासत बनाने में मदद मिलेगी। इस क्षेत्र को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करने की भी योजना है।
टोपरा कलां, चनेटी और सुघ का इतिहास
दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में जो अशोक स्तंभ मौजूद है, उसे बरसों पहले सम्राट अशोक यमुनानगर खंड रादौर के गांव टोपरा कलां से तोड़ कर दिल्ली लेकर आया था। इस 27 टन वजनी स्तंभ को यमुना नदी के रास्ते कोटला नई दिल्ली ले गया। जहां वह अपने नए शहर का निर्माण कर रहा था। इस स्तंभ को मिनारे-ए-जरीन भी कहा जाता था, जिसका अर्थ है सोने का स्तंभ। वहीं गांव चनेटी के करीब 100 वर्ग मीटर के क्षेत्र में ईंटों से बने से 8 मीटर की ऊंचाई वाला एक विशाल मकबरा है। गोल आकार में बना, यह एक पुराना बौद्ध स्तूप है। हेन त्सांग के अनुसार, यह राजा अशोक द्वारा बनाया गया था। इसी तरह सुघ गांव में प्राचीन टीला, जिसे सुघ के प्राचीन स्थल के रूप में भी जाना जाता है, यमुनानगर जिले के अमादलपुर दयालगढ़ गांव में स्थित है। अमादलपुर में सूर्यमंदिर-तीर्थ निकट ही है। टीले की परिधि लगभग 5 किमी है और यह यमुना नदी के बाढ़ क्षेत्र के पश्चिमी तट पर स्थित है।
वर्जन
यमुनानगर एक समय बौद्ध धर्म की नगरी रहा है, जिसके साक्ष्य आज भी मौजूद हैं। यहां की ऐतिहासिक धरोहर पर कई प्रकार के शोध चल रहे हैं। इसके अलावा भविष्य में जल्द ही पुरातत्व पदयात्रा का भी आयोजन किया जाएगा। इससे श्रद्धालु इन स्थानों का भ्रमण कर सकेंगे।
- सिद्धार्थ गौरी, शोधकर्ता, बुद्धिस्ट हेरिटेज।
फोटो कैप्शन- चनेटी में मलएशिया के अवेकनिंग हरमिटेज मंदिर केदाह के मुख्य बौद्ध भिक्षु सेक कायली महाथेरो अपने सदस्यों के साथ। आर्काइव