हादसे की वजह बन चुके सड़क किनारे खड़े सूखे पेड़ों को काटने पर किसी का ध्यान नहीं है। जबकि तीन वर्षों में सूखे पेड़ों के गिरने से तीन लोगों की जान जा चुकी है। बावजूद इसके प्रशासन कार्रवाई करने में सुस्त नजर आ रहा है। सड़क से गुजरने वाले राहगीरों व वाहन चालकों की सुरक्षा से बेपरवाह अधिकारियों को जगाने के लिए अमर उजाला ने रविवार को एनएच-73 (चंडीगढ़-रुड़की) का जायजा लिया। इस दौरान कमानी चौक से हुडा चौकी मोड़ तक ढाई किलोमीटर के बीच एक दर्जन सूखे पेड़ गिरने की कगार पर मिले, जो कभी भी हादसे का सबब बन सकते हैं।
खतरा नंबर एक-
नेशनल हाइवे 73 पर कमानी चौक के नजदीक कृष्णा रिसोर्ट के बाहर एक सूखा पेड़ सड़क पर झुका हुआ है। पेड़ गिरा तो सड़क से गुजरने वाले वाहन और राहगीर इसकी चपेट में आ सकते हैं।
खतरा नंबर दो-
नेशनल हाइवे 73 पर को आपरेटिव बैंक के सामने एक सूखा पेड़ सड़क की ओर झुका हुआ है। चोपड़ा गार्डन आने-जाने वाली सड़क के किनारे लगे इस पेड़ की हालत देखकर कालोनी के लोग भी सहमे रहते हैं।
खतरा नंबर तीन-
नेशनल हाइवे 73 पर को आपरेटिव बैंक के सामने एक सूखा पेड़ गिरने की कगार पर है। यदि यह गिरा तो सीधे सड़क पर गिरेगा, जिससे कोई भी इसकी चपेट में आ सकता है।
खतरा नंबर चार-
नेशनल हाइवे 73 पर कन्हैया साहिब चौक के नजदीक एक सूखा पेड़ हाईटेंशन तारों की ओर झुका हुआ है। हाईटेंशन तार हाईवे के ऊपर से गुजर रही है। पेड़ गिरने पर तार टूटना तय है। इससे बड़ा हादसा हो सकता है।
खतरा नंबर पांच-
नेशनल हाइवे 73 पर संत निश्चल सिंह पब्लिक स्कूल के नजदीक हाईटेंशन तार से ऊंचा एक सूखा हुआ पेड़ है। इस पेड़ के नीचे कूड़ा डालकर उसमें आग लगा दी जाती है, जिससे पेड़ भी काफी हद तक जलकर कमजोर हो गया है और कभी भी हाईटेंशन तार पर गिर सकता है।
-सूखे पेड़ों की रिपोर्ट तैयार करने में लग जाते हैं कई माह-
डिस्ट्रिक रोड सेफ्टी कमेटी की बैठक में पिछले तीन वर्षों से सड़क किनारे लगे सूखे पेड़ों का मुद्दा प्रमुखता से उठाया जाता रहा है। प्रोजक्टर के माध्यम से इन पेड़ों को अधिकारियों को दिखाया गया। हर बार संबंधित विभाग के अधिकारियों को इन पेड़ों को कटवाने के निर्देश दिए जाते हैं, लेकिन हालात यह है कि पेड़ कटवाने में विभाग की कार्रवाई इतनी सुस्त होती है कि जब तक वह पेड़ काटे जाते हैं, तब तक दर्जनों अन्य पेड़ सूख चुके होते हैं।
ऐसे में विभागीय कार्रवाई फिर नए सिरे से शुरू होती है, यानि सूखे पेड़ों की पहचान कर उनकी रिपोर्ट तैयार की जाती है। फिर फाइल को अधिकारियों तक पहुंचाया जाता है। अधिकारी की मंजूरी मिलने के बाद पेड़ों को कटवाने की कार्रवाई आरंभ की जाती है। अमर उजाला ने जिन सूखे पेड़ों को हाई लाइट किया, उनमें अधिकतर को संबंधित विभाग रिपोर्ट तैयार कर चुका है, लेकिन कई माह बीत जाने पर भी इन्हें काटा नहीं गया है।
-सूखे पेड़ों ने तीन साल मेें ली तीन की जान-
जुलाई 2012 में औरंगाबाद के नजदीक एक सूखा पेड़ मोटरसाइकिल सवार पब्लिक हेल्थ विभाग के एक आपरेटर के ऊपर गिर गया था, जिससे उसकी मौत हो गई। वर्ष 2012 में ही सरनी चौक के नजदीक भगत सिंह पार्क में लगा एक पेड़ देर शाम आई आंधी में सड़क पर गिर गया। छोटा माडल टाउन निवासी एक ठेकेदार पेड़ के नीचे दब गया, जिससे उसकी मौत हो गई।
करीब ढाई साल पहले नेशनल हाईवे 73 ए पर गांव पीपली माजरा के नजदीक एक सूखे पेड़ की मोटी टहनी एक स्कूटर सवार पर गिर गई थी, जिससे उसकी मौत हो गई।
सुखे पेड़ों को काटने के लिए हेडक्वार्टर पत्र भेजा है। इस संबंध में मंजूरी मिलते ही कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
निवेदिता, जिला वन अधिकारी।