संवाद न्यूज एजेंसी
जगाधरी। आर्थिक तंगी और विपरीत परिस्थितियां भी यदि मजबूत इरादों के आगे आ जाएं, तो वे महज रुकावटें बनकर रह जाती हैं। शहर की रहने वाली संजू ने परिवार की कमजोर आर्थिक स्थिति के बाद भी कराटे में राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर कई पदक अपने नाम किए हैं। आज वे एक विद्यालय में बालिकाओं को आत्मरक्षा के गुर सिखा रही हैं।
संजू के मुताबिक परिवार की माली हालत अच्छी नहीं है। पिता राधेश्याम मजदूरी करते हैं और चार बेटियों व एक बेटे वाले परिवार का पालन करते हैं। वे कराटे खेलना चाहती थी। लेकिन परिस्थितियां पक्ष में नहीं थी। उन्होंने वर्ष 2021 में शहर की बामणिया कराटे अकादमी से इस साहसिक खेल की शुरुआत की थी। कोच विकास बामणिया के मार्गदर्शन में अभ्यास किया और अपनी लगन के बल पर जिलास्तर पर स्वर्ण पदक हासिल किया।
वर्ष 2022 में राज्य स्तर पर कांस्य पदक और वर्ष 2023 में जिलास्तर पर विभिन्न स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। रोहतक में हुई स्टेट चैंपियनशिप में उन्होंने काता व कुमिते के इवेंट में दो स्वर्ण पदक जीते। इसके बाद राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं और राष्ट्रीय स्तर की स्पर्धाओं में भी उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण और रजत पदक अपने नाम किए। उन्होंने राष्ट्रीय प्रतियोगिता की कुमिते इवेंट में स्वर्ण व काता में रजत पदक जीता है।
दूसरों के लिए बनीं प्रेरणास्रोत
कोच विकास बामणिया का कहना है कि अपनी सफलताओं से अलग पहचान बनाने वाली संजू आज समाज की अन्य बालिकाओं और युवाओं के लिए एक मिसाल बन चुकी हैं। वह अपनी पढ़ाई और खेल अभ्यास के साथ-साथ विद्यालय में अन्य विद्यार्थियों को प्रशिक्षण दे रही हैं। उनका यह प्रयास न केवल बालिकाओं को शारीरिक और मानसिक रूप से सशक्त बना रहा है, बल्कि उनमें आत्मबल भी जगा रहा है। संजू का जीवन यह साबित करता है कि यदि हौसला बुलंद हो, तो हर अंधेरे को चीरकर उजाले की नई राह बनाई जा सकती है।