अंतरराष्ट्रीय युवा हिंदू वाहिनी के तत्वावधान में प्यारे महाराज मंदिर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में कथा व्यास नितिन भारद्वाज शास्त्री ने ऋषभदेव व भरत चरित्र का व्याख्यान किया। शास्त्री ने कहा कि ऋषभदेव विष्णु भगवान के आठवें अवतार हुए। सनातन धर्म में 24 अवतार भगवान के हुए, वैसे ही जैन धर्म में 24 तीर्थ कर हुए हैं। ऋषभदेव जैन धर्म के पहले तीर्थ कर हैं।
ऋषभदेव के 100 पुत्र हुए। बड़े पुत्र का नाम भरत है। ऋषभदेव सबको ज्ञान देते हैं कि यह जीवन संतों की चरणों की सेवा के लिए मिला। उनकी परम ज्योति परमात्मा में मिल गई। ऋषभदेव के पुत्र भरत को जब पिता के त्याग के बारे में पता लगा, तो जीवन से ग्लानि हो गई। अपने पुत्र सुमति को राजगद्दी पर बिठाया स्वयं वन में चले गए। एक दिन नेत्र बंद करके जल में खड़े होकर जप कर रहे थे। आंखें खुली नदी की दूसरी ओर एक गर्भवती हिरणी शेर से जान बचाकर नदी में कूद पड़ी। हिरणी ने नदी में ही बच्चे को जन्म दिया। हिरनी तो दूसरी तरफ भाग गई। भरत ने नदी में कूद कर बच्चे को बचाया। उसकी देखभाल करने लगे। उससे प्रेम करने लगे। वह हरि भजन करने को आए, फंस गए हिरण प्रेम में। मृत्यु के समय राम, कृष्ण याद नहीं किए। हिरण के बारे सोचते रहे। मरणोपरांत हिरण की योनि में जाना पड़ा। मरते समय जिसे सोचोंगे उसी योनि में जाना पड़ेगा। मौके पर वाहिनी के प्रदेशाध्यक्ष विपिन वर्मा, अध्यक्ष सुरेंद्र खरबंदा, विनोद, संरक्षक धर्मराज दीक्षित, मंडल मंत्री अमित व विदित आदि मौजूद रहे।