संवाद न्यूज एजेंसी
जगाधरी। जम्मू काॅलोनी निवासी निर्मल चौहान ने स्नातकोत्तर और फिर बीएड करने के बाद नौकरी न करके समाजसेवा करने का रास्ता चुना। 55 स्वयं सहायता समूह बनाकर सैकड़ों महिलाओं को उनके पैरों पर खड़ा किया। बिना किसी संस्था और संगठन के सहयोग के महिलाओं को अबला से सबला बना दिया।
निर्मल ने कड़ी मेहनत और कठिनाइयों के बाद यह मुकाम हासिल किया है। उनका यह सफर और मुकाम आज महिलाओं के लिए एक मिसाल है। उनके प्रयासों से आज कई परिवार साहूकारों के चंगुल से निकल चुके हैं और सैकड़ों महिलाएं अपना रोजगार कर रही हैं।
उन्होंने बताया कि उनके पति यशपाल सिंह चौहान बीएसफ में नौकरी करते हैं। वर्ष 2007 में वे फाजिल्का से यमुनानगर आई थीं। यहां के माहौल और व्यवस्था से वह काफी आहत हुईं। स्नातकोत्तर और फिर बीएड पास होने के कारण उन्हें अध्यापिका की नौकरी आसानी से मिल सकती थीं, लेकिन हालातों ने उसको क्षेत्र के लिए कुछ करने के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने देखा कि परिवार साहूकारों के चंगुल में फंसे हुए हैं। मकान बनाने या कुछ और काम करने के लिए बैंकों के चक्कर लगा रहे हैं। महिलाओं के पास अपनी आय का कोई साधन नहीं है। इसके बाद उन्होंने इस दिशा में कदम बढ़ाया। उन्होंने सात जुलाई 2007 में पहला स्वयं सहायता समूह बनाया और कुछ महिलाओं को जोड़ा।
थोड़ा-थोड़ा पैसा लगाकर उन्होंने अचार-मुरब्बा बनाने का काम शुरू किया। समय के साथ काम और मांग दोनों बढ़ती गई। इससे उनके स्वयं सहायता समूहों की संख्या भी बढ़ने लगी। उनके प्रयासों से आज 55 स्वयं सहायता समूह काम कर रहे हैं। इससे करीब 15 समूह स्कूल में मिड-डे-मील का काम संभाल रहा है।
उन्होंने बताया कि अभी उनके समूहों को दिल्ली के भारत मंडप्पम में कार्यक्रम में बुलाया गया था। जहां उन पर डक्यूमेंट्री बनाई गई थी। वहीं, अभी उनके कई समूह पब्लिक हेल्थ के प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। कोई परेशान महिला उनको रात के समय भी फोन करती हैं, तो वह मदद के लिए पहुंच जाती हैं। इसके साथ जरूरतमंद युवतियों के विवाह में भी आर्थिक सहयोग करती हैं।
ऐसे लोग जो कि अपनी दवा का खर्च नहीं उठा पाते हैं उनका आर्थिक सहयोग करती हैं। अब तक वह हजारों लोगों को आर्थिक मदद दे चुकी हैं। उनका कहना है कि बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ मुहिम के तहत उन्होंने एक गली का नाम लाड़ली के नाम रखा हुआ है। समाज में जाकर बेटियों का महत्व बताती हैं। कालोनी की बेटियों का जन्मदिन नहीं भुलती हैं, उनको उपहार एक दिन पहले ही पहुंचा देती है।
किरण, राधा, रेणू, कमला ने स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर इन महिलाओं ने रोजगार भी बनाया और अपना मकान भी बना लिया। इस दौरान न तो उन्होंने किसी साहूकार और न ही बैंक से ऋण लिया। निर्मल चौहान ने कहा कि जम्मू कॉलोनी में 80 प्रतिशत दुकानें महिलाएं चल रही हैं। कोई मनियारी का सामान बेच रही है तो कोई ब्यूटीपार्लर चला रही हैं। जून 2013 में निर्मल चौहान पार्षद चुनी गई, लेकिन स्वयं सहायता समूहों का संचालन बरकरार रखा।