संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। एसएस जैन सभा मॉडल टाउन के प्रांगण में चल रहे चातुर्मास के 114 वें दिन प्रवचन प्रभाविका महा साध्वी डॉ. स्वाति महाराज ने शिष्यों के प्रकार बताए। साथ ही शिष्यों को सभी चार प्रकारों का विस्तार से वर्णन किया।
उन्होंने एक दृष्टांत के माध्यम से समझाया कि गर्ग गोत्रीय गार्ग्य मुनि एक विशिष्ट आचार्य थे योग्य गुरु थे किंतु उनके शिष्य उद्दंड अविनीत और स्वच्छंद थे। उन शिष्यों के अभद्र व्यवहार से समस्त आराधना में विघ्न आते रहने पर भी आचार्य गार्ग्य लंबे कल तक धैर्य से शिक्षा देते रहे तथा स्वयं की समाधि साधते रहे। अंत में शिष्यों में सुधार असंभव देखकर शिष्यों का परिहार किया और एकांत में विचरण करने लगे।
आत्मार्थी बहुश्रुत मुनि के लिए यही कर्तव्य है की समाधि और आराधना यदि समूह से भंग होती है या कोई योग्य सहायक ना मिले तो अपने संयम की रक्षा करता हुआ अकेले रहकर साधना करे। घोड़े चार प्रकार के होते हैं पहले जो चाबुक देखते ही दौड़ने लगे दूसरा एक चाबुक खाकर सही रास्ते पर चलने लगे तीसरा बार-बार चाबुक खाकर सही रास्ते पर चले और चौथा बार-बार चाबुक खाकर भी सही रास्ते पर ना चले।
इसी प्रकार शिष्य भी चार प्रकार के होते हैं पहले जो गुरु के इशारे समझते ही सन्मार्ग पर दौड़े, दूसरे गुरु की आज्ञा निर्देश से सन्मार्ग पर चले तीसरा बार-बार प्रेरित करने पर सन्मार्ग पर चले और चौथा बार-बार समझाने से भी ना समझे और बुरे रास्ते पर चलता रहे। गार्ग्य मुनि के शिष्य चौथी प्रकार के थे जब दीक्षा दी तब अनुकंपा से तथा सुधार की आशा से दीक्षा दी होगी उनको वर्षों तक निभाया भी सही पर आश्चर्य है कि उन संतों में से एक भी नहीं सुधरा।