संवाद न्यूज एजेंसी
साढौरा। गायत्री ज्योतिष अनुसंधान केंद्र के संचालक डॉ. रामराज कौशिक ने बताया कि कुछ विद्वानों का मानना है कि सबसे पहले भगवान परशुराम ने कांवड़ से गंगाजल लाकर उत्तर प्रदेश के बागपत के पास स्थित पुरा महादेव का जलाभिषेक किया था। परशुराम इस प्राचीन शिवलिंग का जलाभिषेक करने के लिए गढ़मुक्तेश्वर से गंगा का जल लाए थे।
आज भी इस परंपरा का पालन करते हुए सावन के महीने में गढ़मुक्तेश्वर से जल लाकर लाखों लोग पुरा महादेव का जलाभिषेक करते हैं। गढ़मुक्तेश्वर का वर्तमान नाम ब्रजघाट है। वहीं कुछ मान्यताओं के अनुसार भगवान राम पहले कांवड़िए थे। उन्होंने बिहार के सुल्तानगंज से कांवड़ में गंगाजल भरकर, बाबाधाम में शिवलिंग का जलाभिषेक किया था। पुराणों के अनुसार कांवड़ यात्रा की परंपरा, समुद्र मंथन से जुड़ी है।
समुद्र मंथन से निकले विष को पी लेने के कारण भगवान शिव का कंठ नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाए। परंतु विष के नकारात्मक प्रभावों ने शिव को घेर लिया। शिव को विष के नकारात्मक प्रभावों से मुक्त कराने के लिए उनके अनन्य भक्त रावण ने ध्यान किया। इसके बाद कांवड़ में जल भरकर रावण ने पुरा महादेव स्थित शिवमंदिर में शिवजी का जलाभिषेक किया।
सावन माह में कभी कर सकते हैं जलाभिषेक : डॉ. कौशक
डॉ. रामराज कौशिक ने बताया कि वैसे तो सावन महीने के किसी भी दिन शिव का जलाभिषेक कर सकते हैं लेकिन कांवड़िए विशेष रूप से कांवड़ के जल से शिव का अभिषेक अपने क्षेत्र के शिव मंदिरों में शिवरात्रि के दिन करते हैं। पंचांग अनुसार इस साल सावन शिवरात्रि दो अगस्त को पड़ रही है पंचांग के अनुसार, सावन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि दो अगस्त को दोपहर 3 बजकर 26 मिनट से शुरू होगी। वहीं, अगले दिन तीन अगस्त को दोपहर 3 बजकर 50 मिनट पर समाप्त होगी। ऐसे में सावन शिवरात्रि व्रत दो अगस्त शुक्रवार को किया जाएगा। इस दिन आप किसी भी समय कांवड़ जल चढ़ा सकते हैं और अगले दिन तीन अगस्त को भी 10 बजे तक जल चढ़ा सकते हैं।