संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। श्री कपालमोचन मेला एक से पांच नवंबर तक आयोजित होगा। मेले में आठ लाख से अधिक श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है। कपालमोचन में तीन सरोवर हैं, जिनका अलग-अलग महत्व है। सबसे पहला स्नान कपालमोचन सरोवर में, दूसरा स्नान ऋणमोचन सरोवर और तीसरा स्नान सूरजकुंड सरोवर में किया जाता है।
यहां पर गुरुद्वारा साहिब पहली एवं दसवीं पातशाही है। सिखों के दशम गुरु श्री गोबिंद सिंह विक्रमी संवत 1742 में पहली बार और उसके बाद संवत 1746 में भंगानी का युद्ध जीतने के बाद कपालमोचन आए थे। वह 52 दिन तक यहां रूके थे। यहां रुकने पर उन्होंने ऋणमोचन व कपालमोचन में स्नान किया। अपने अस्त्र शस्त्र को धोया।
कपालमोचन और ऋण मोचन तीर्थों के बीच एक प्राचीन अष्टकौण गुरुद्वारा है। उन्होंने कार्तिक पूर्णिमा के दिन गुरु नानक देव का प्रकाश पर्व मनाने वालों की सारी कामनाएं पूरी होने का वरदान दिया था। तब से आज तक यहां इस मौके पर गुरु भक्त आकर गुरु पर्व मनाते हैं। मेले के दौरान रात्रि के समय श्रद्धालु यहां दीये भी जलाते हैं। मान्यता है कि दीये जलाकर लोग अपने जीवन में रोशनी की कामना करते हैं।
एक अन्य मान्यता के अनुसार इस स्थान पर एक सिद्ध पुरुष जिसका नाम दूधाधारी बाबा था, वह यहां पर रहते थे और पूजा अर्चना करते थे। कहते हैं कि आसपास के क्षेत्र में उनकी काफी मान्यता थी। समय पर उनसे मुरादे मांगने आते थे। लोगों की मुरादें पूरी होती थी। आज भी मेले के समय इस सरोवर के तट पर देश के कोने-कोने से साधु आकर सरोवर के तट पर तपस्या करते हैं और धूना रमाते हैं।
भगवान शिव को ब्रह्म हत्या से मिली थी मुक्ति
पुराणों में कपालमोचन सरोवर का प्राचीन नाम सोमसर एवं औशनस तीर्थ था। जिसका उल्लेख महाभारत और वामन पुराण में मौजूद है। पौराणिक कथा के अनुसार ब्राह्मण की हत्या करने के कारण बछड़े व उसकी माता को ब्रह्म हत्या का घोर पाप लग गया था, जिससे बछड़े व गाय का रंग काला पड़ गया था । गाय और बछड़े ने कपालमोचन सरोवर में स्नान किया और वह इस पाप से मुक्त हो गए। दोनों का रंग सफेद हो गया। शंकर भगवान ने कपालमोचन सरोवर में स्नान करके अपने आप को ब्रह्म हत्या के दोष से मुक्ति पाई थी।
श्रीराम, श्रीकृष्ण, गुरु नानक देव जी व गुरु गोबिंद सिंह भी आए थे
भगवान श्री रामचंद्र जी, भगवान कृष्ण जी, गुरु नानक देव जी, गुरु गोबिंद सिंह जी भी दो बार यहां पर आए थे। यहां के पवित्र सरोवरों में स्नान किया था। प्रतीकात्मक रूप में गऊ और बच्छा पत्थर की मूर्ति के रूप में यहां आज भी विद्यमान है। कपालमोचन और ऋणमोचन सरोवर में स्नान करने के बाद श्रद्धालु सूरजकुंड में सरोवर में स्नान करते हैं। इस सरोवर के साथ भी अनेक दंत कथाएं जुड़ी हुई हैं। श्री कृष्ण जी ने महाभारत युद्ध के बाद पांडवों के साथ इस सरोवर में स्नान किया था।