संवाद न्यूज एजेंसी
व्यासपुर। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम में चले साप्ताहिक सत्संग में साध्वी सुयशा भारती ने मन की प्रवृत्ति के बारे में समझाते हुए कहा कि सुख की खोज करना मन का स्वभाव है। हमारा मन राजा की तरह जीवन व्यतीत करना चाहता है, इसलिए मन कभी एक स्थान पर स्थिर नहीं होता। मन सदैव रस ढूंढता है किंतु दुर्भाग्य की बात है जो रस मन को चाहिए वह तो इस संसार के किसी भी व्यक्ति, वस्तु या स्थान से प्राप्त नहीं हो सकता।
साध्वी ने कहा कि जीवन में मनुष्य को उसका मन नहीं भटकाता अपितु मन के विकार भटकाते हैं और ये विकार मन में तभी उत्पन्न होते हैं जब मन अपना वास्तविक स्वरूप भूल जाता है। अंधेरा प्रकाश की अनुपस्थिति में ही आता है, अंधेरे को बुलाने के लिए किसी स्रोत की आवश्यकता नहीं होती ठीक इसी प्रकार मन अपने ज्योति स्वरूप को न पहचान पाए तो कदाचित जीवन में विकारों का आना निश्चित है।
साध्वी सुयशा ने कहा कि गुरु की शरणागति होकर उनसे ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति करके निरंतर गुरु आज्ञा में रहते हुए ध्यान साधना करने से ही मन के विकार स्थाई रूप से समाप्त हो सकते हैं किंतु प्रश्न है कि गुरु की क्या आवश्यकता है। एक साधारण मनुष्य के पास इतना आत्मबल नहीं होता जितना मन के विकारों को जीतने के लिए चाहिए।
उन्होंने बताया कि गुरु की शरणागत होकर ही मन के विकारों से मुक्ति पाई जा सकती है क्योंकि जब हम स्वयं मन को वश में करने का प्रयास करते हैं तो कदाचित मन अपने पूरे दल बल के साथ हमारी बुद्धि और चित्त पर हावी हो जाता है। अंत में भजनों से गुरु का गुणगान किया गया।
व्यासपुर में आयोजित साप्ताहिक सत्संग में उपस्थित संगत। आयोजक