प्रदीप कांबोज
रादौर। शहर के कस्तूरबा गांधी आश्रम की संचालिका 102 वर्षीय गांधीवादी एवं स्वतंत्रता सेनानी तारा बहल ने अपना पूरा जीवन गांधीजी के आदर्शों को समर्पित किया है। तारा बहल जिले की एकमात्र जीवित महिला बताई जाती हैं, जिन्होंने गांधी जी के साथ काम किया है। आज भी वह सप्ताह में एक दिन बुधवार को मौन व्रत रखती हैं। यह परंपरा वह करीब 82 वर्षों से निभा रही हैं।
तारा बहल 13 वर्ष की उम्र में अपने बड़े भाई बैजनाथ बहल के साथ नागपुर में पहली बार महात्मा गांधी से मिली थीं। गांधी जी के विचारों से प्रभावित होकर उन्होंने आजीवन विवाह नहीं किया और देश व समाजसेवा को अपना जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर को करीब से देखा और देश को आजाद होने के साथ विभाजन का दर्द भी देखा।
आजादी के बाद वर्ष 1952 में तारा बहल शिक्षा ग्रहण करने जापान गईं। वर्ष 1984 में वह समाज कल्याण विभाग, पंजाब से सेवानिवृत्त हुईं। इसके बाद भी उनका सामाजिक कार्य जारी रहा। वह नशाखोरी के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाने के साथ किसानों को जैविक खेती के लिए प्रेरित करती हैं। संवाद
संसद में हंगामे से होती हैं दुखी
देश के मौजूदा हालात पर तारा बहल ने कहा कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि आजादी के बाद शहीदों के सपनों का भारत ऐसा होगा। टीवी पर संसद की कार्रवाई देखते समय सदस्यों के बीच होने वाले विवाद से उन्हें दुख होता है। उनका कहना है कि जनप्रतिनिधियों को जनता की समस्याओं और देश के विकास के मुद्दों पर चर्चा करनी चाहिए। संसद का समय बर्बाद होने से देश का नुकसान होता है। उन्होंने अपराध, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, गरीबी, नशाखोरी, कालाबाजारी और अन्य समस्याओं पर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि शहीदों ने देश की आजादी के लिए बलिदान दिया था।
आश्रम में लगीं गांधी जी की 200 से अधिक तस्वीरें
गांधी जी की स्मृतियों को जीवित रखने के लिए तारा बहल ने कस्तूरबा गांधी आश्रम में गांधी जी के जीवन और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी प्रदर्शनी लगाई है। इसमें बापू की 200 से अधिक तस्वीरें प्रदर्शित हैं। तस्वीरों के माध्यम से गांधी जी के आंदोलनों और आजादी के संघर्ष को दर्शाया गया है। स्कूल और कॉलेजों के विद्यार्थी भी इस प्रदर्शनी को देखने पहुंचते ह
तारा बहल।