संवाद न्यूज एजेंसी
जगाधरी। हनुमान गेट स्थित दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम में साप्ताहिक सत्संग हुआ। सत्संग में आसपास सहित अन्य क्षेत्रों से श्रद्धालु पहुंचे। आशुतोष महाराज के शिष्य स्वामी गुरुदेवानंद ने प्रवचन दिए। उन्होंने श्रद्धालुओं को गुरु के वचनों की महिमा बताई।
उन्होंने कहा कि गुरु वचन मुख से कहे शब्द मात्र नहीं होते, बल्कि उनके वचनों में तो संपूर्ण सृष्टि को बदलने का सामर्थ्य समाया होता है। गुरु वचन उनकी तपस्या की अभिव्यक्ति होते हैं, तभी उनमें हर असंभव कार्य को संभव करने का सामर्थ्य समाया होता है। परमपिता परमात्मा जब साकार रूप धारण कर धरती पर आते हैं, तब वे प्रकृति के बंधनों में बंधे दृष्टिगोचर होते हैं, लेकिन वास्तविक में सदैव मुक्त रहते हैं।
वे केवल हम जीवों के कल्याण हेतु धरती पर अवतरित होकर धर्म की रक्षा और अधर्म का नाश करते हैं। गुरु वचनों पर विश्वास रखते हुए मां शबरी ने श्रीराम की भक्ति प्राप्त की और भक्त शिरोमणि कहलाईं। पूर्व जन्मों के पुण्य संस्कारों की पूंजी ही ऐसी पूर्ण ब्रह्म सत्ता की शरण तक लेकर जाती है। अन्यथा कई कल्पों तक जीवात्मा जन्म मरण के चक्रव्यूह में फंसा रहता है।
जब प्रभु की कृपा दृष्टि जीव पर होती है, तभी वह गुरु शरण में आकर बैठता है। उनके वचन ग्रहण करके जीवन को कल्याणकारी बनाता है। एक साधारण व्यक्ति भी गुरु वचनों का अनुसरण कर सहज ही देवत्व प्राप्त कर लेता है। परंतु यदि शिष्य अपने मन और बुद्धि को गुरु वचनों से अधिक महत्व देता है, तो उसका आध्यात्मिक पतन हो जाता है।
उन्होंने कहा कि राजा जनमेजय ने गुरु वचनों पर संशय कर अपने जीवन का पतन कर लिया था। ऋषि वेदव्यास ने अपने वचनों में कहा कि मनुष्य को अपना भविष्य पता हो तब भी वह भविष्य बदल नहीं सकता है। परंतु गुरु कृपा से बड़े से बड़ा कर्म संस्कार टल जाता है। यह सुनकर राजा जनमेजय ने गुरु वेदव्यास से अपना भविष्य पूछा और अपने भविष्य बदल देने का दावा कर दिया।
वह संशयग्रस्त होकर व अपने ही मन बुद्धि के दायरे में फंसकर गुरु से भी विमुख हो गए। उन्होंने बहुत प्रयास किए, लेकिन अपना भविष्य बदल नहीं पाए। अंत में कुष्ठ रोग से ही उनकी मृत्यु हो गई। इतिहास साक्षी है कि जब कोई गुरु वचनों पर दृढ़ विश्वास से चला तो उसके जीवन का कल्याण ही हुआ। गुरु वचनों पर संशय करने वाले को जीवन में बड़ी हानि का सामना करना पड़ा है।