संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। जिले में करीब 20 दिनों से गेहूं फसल की कटाई हो रही है। फसल कटाई की प्रक्रिया दमा व टीबी के रोगियों के लिए नुकसान देने वाली हैं। वातावरण में धूल, भूसा के अत्यधिक महीन कण श्वास के जरिए फेफड़ों तक पहुंच कर मरीजों की दिक्कत बढ़ा रहे हैं। वगीं आंखों में एलर्जी, लालिमा, खुजली के रोगी भी तेजी से अस्पतालों में पहुंच रहे हैं। पहले सांस लेने में दिक्कत होने पर प्राइवेट व सिविल अस्पताल में रोजाना 35 से 40 मरीज ही पहुंचते थे, वहीं अब इनकी संख्या 100 के पार पहुंच गई है।
जिले में इस बार गेहूं का रकबा 90 हजार हेक्टेयर था। इसमें से 90 प्रतिशत गेहूं कंबाइन मशीन से तो बाकी कटाई हाथों से की जा रही है। कटाई के बाद गेहूं को हडंबा मशीन से निकाला जाता है। इसके साथ ही भूसे के जो महीन कण होते हैं वह हवा में मिल जाते हैं। हवा का रूख जिस तरफ होता है भूसे के कण उसी तरफ आबादी में में पहुंच जाते हैं।
इस वक्त चारों तरफ गेहूं की कटाई हो रही है इसलिए शहर से लेकर हर गांव में लोग हवा में मौजूद भूसे के कणों से परेशान हैं। हडंबा मशीन न चले तो पशु चारे का संकट हो जाता है। हालांकि जो गेहूं कंबाइन मशीन से काटी गई है, उसके फानों को स्ट्रा रीपर की मदद से काट कर भूसा बनाया जा रहा है। स्ट्रा रीपर से जब फाने कटते हैं तो इससे भी भूसे के महीण कण उड़ कर हवा में मिल जाते हैं।
बेवजह घर से बाहर न निकलें : डॉ. सचिन
मुकंद लाल जिला नागरिक अस्पताल के डॉ. सचिन ने बताया कि वातावरण में धूल, भूसा के अत्यधिक महीन कण श्वास के जरिए फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं। इससे दमा रोगियों को सांस लेने में दिक्कत होने लगती है। जरूरी है कि जो लोग उक्त बीमारियों से ग्रस्त हैं वह अभी कुछ दिन बेवजह घर से बाहर न निकलें। गांवों में लोगों को ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत है। गांवों में ही फसल कटाई के दौरान भूसे का असर ज्यादा देखने को मिलता है। भूसे के कण इतने बारीक होते हैं कि वह दिखाई भी नहीं देते और सांस से हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। जिन्हें सांस लेने में दिक्कत हो रही है। ऐसे रोगी ओपीडी में पहुंच रहे हैं। उन्होंने लोगों को सलाह दी है कि अभी कुछ दिन मास्क जरूर लगाएं।