जगाधरी। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम हनुमान गेट में रविवार को साप्ताहिक सत्संग का आयोजन किया गया। गुरु आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी वंशिका भारती ने प्रवचन में श्रद्धालुओं को गुरु भक्ति का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि समाज का तर्क पूर्ण बुद्धि रखने वाला वर्ग अकसर गुरु और भक्ति को पृथक मानता है। किंतु गोस्वामी तुलसीदास महाराज ने नवधा भक्ति में संतों के संग को ही भक्ति का प्रथम स्वरूप बताया है।
साध्वी ने कहा कि यह वास्तविकता है कि गुरु शरण में जाकर ही भक्ति का आरंभ होता है। चूंकि गुरु के बिना की भक्ति में या तो दंभ की दुर्गंध होगी अथवा इच्छापूर्ति की कामना होती है। गुरु आशुतोष महाराज कहते हैं कि ब्रह्मज्ञान के बिना भक्ति निष्प्राण है और निष्प्राण तन को कितना भी सुंदर सजा दिया जाए वह दुर्गंध युक्त ही रहेगा। हमें गुरु के द्वारा ब्रह्मज्ञान की दीक्षा प्राप्त होती है, तब हम भक्ति के साम्राज्य में प्रवेश करते हैं।
उन्होंने बताया कि ब्रह्मज्ञान से विवेक जागृत होता है और विवेक पूर्ण होकर जब हम अपने जीवन में आत्म समीक्षा कर गहन चिंतन करते हैं। इस चिंतन से समझ पाते हैं कि संसार में कुछ भी सत्य नहीं है। संसार की कामनाओं के लिए भक्ति करना व्यर्थ है। यदि हम संसार की वस्तुओं को प्राप्त कर भी लें, तो वह समय के साथ या तो दुख का कारण बन जाती है या समाप्त हो जाती हैं। साध्वी ने कहा कि एक भक्त इस बात पर भी विचार करता है कि भक्ति परमात्मा का कृपा प्रसाद है, मेरा स्वयं का पुरुषार्थ नहीं तो कदाचित भक्त में कभी अहंकार या दंभ भी नहीं आ सकता। ब्रह्मज्ञान की ध्यान साधना सर्वप्रथम हमारी चेतना को भौतिक स्तर से ऊपर उठाकर आत्मिक स्तर पर ले जाती है। जब हम अपने जीवन में गुरु भक्ति को स्थान देते हैं तभी वास्तविक रूप में हम जीवन मुक्ति का आनंद प्राप्त करते हैं।