प्रदेश सरकार की ओर से जमीन के नीचे से बह रही सरस्वती नदी के जल का पता लगाने के लिए पांच साल पहले कवायद शुरू की गई, लेकिन बाद में इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
सरस्वती शोध संस्थान ने भी इस कवायद को सिरे चढ़ाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।
सरस्वती शोध संस्थान की पहल पर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2008 में ऑयल एंड नेचुरल गैस कारपोरेशन (ओएनजीसी) की मदद से प्रदेश में सरस्वती नदी के मार्ग पर जमीन के नीचे बह रहे पानी का पता लगाने के लिए कदम बढ़ाया। इसके तहत 21 अप्रैल 2008 को सिंचाई विभाग के प्रिंसिपल सेक्रेटरी की ओर से ओएनजीसी को पत्र लिखकर प्रदेश में दो स्थानों पर सर्वे करने का अनुरोध किया गया।
ओएनजीसी की ओर से 2 मई 2008 को प्रदेश सरकार को पत्र लिखकर इस कार्य के लिए हामी भर दी गई। ओएनजीसी ने दो स्थानों पर जमीन के नीचे गहराई में ड्रिल करना था। एक ड्रिल आदिबद्री क्षेत्र और दूसरा कलायत में किया जाना था, लेकिन यह कार्य अब तक शुरू नहीं हो पाया है। ओएनजीसी की ओर से इसके लिए सर्वे तक नहीं किया गया। सर्वे का काम शुरू न होने पर प्रदेश सरकार की ओर से ओएनजीसी को शुरुआत में रिमाइंडर भी भेजा गया था। सूत्र बताते हैं कि सर्वे के बाद जमीन से निकलने वाली पानी के इस्तेमाल को लेकर प्रदेश सरकार की कार्य योजना के अभाव में ओएनजीसी ने इस प्रोजेक्ट से अपने हाथ वापस खींच लिए।
हालांकि ओएनजीसी इसके प्रति पूरी तरह आश्वस्त थी कि जमीन के लिए पानी अवश्य निकलेगा। ओएनजीसी ही राजस्थान में सबसे पहले जमीन के नीचे बह रही सरस्वती नदी के पानी को जमीन के ऊपर लाया था।