संवाद न्यूज एजेंसी
जगाधरी। यदि आपके बच्चे का हाथ हर समय मोबाइल पर रहता है और वह स्वयं को कमरे में बंदकर घंटों गेम खेलता रहता तो सावधान हो जाइए। आपके बच्चों में भी हिंसा, गुस्सा व अकेलेपन की प्रवृत्ति घर कर रही है तो इसे इशारा समझें। जिलेभर में ऑनलाइन गेम की लत के यूं तो सैकड़ों आदी हैं, लेकिन 12 मामले बेहद गंभीर हैं। इनमें से पांच की स्थिति काउंसलिंग के बाद अब बेहतर है। माता-पिता व बड़ों का साथ व समय मिलने के बाद बच्चों का व्यवहार सामान्य हो रहा है।
गाजियाबाद में बुधवार को तीन सगी बहनों ने गेम की लत के कारण नौवीं मंजिल से कूदकर सामूहिक आत्महत्या की घटना ने माता-पिता की चिंता बढ़ा दी है। चूंकि पांच में से हर तीसरा बच्चा ऑनलाइन गेम में व्यस्त रहता है। कई बच्चे तो ऐसे हैं, जो इसके इतने आदी हो गए हैं कि खान-पान के साथ वे अपनी सुध-बुध भी खो चुके हैं। गेम के कारण बच्चों की शारीरिक के साथ मानसिक स्थिति पर बहुत ज्यादा बुरा असर पड़ रहा है। बच्चे हिंसक हो रहे हैं और रवैया गुस्सैल हो जाता है, जो माता-पिता की चिंता का कारण बन रहा है। वहीं, इस बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों की इस हालत के जिम्मेदार माता-पिता ही है। भले उन्होंने जानबूझकर ऐसा नहीं किया, लेकिन बच्चों को समय न देकर उन्हें मोबाइल के करीब कर दिया है।
विशेषज्ञों और मनोवैज्ञानिकों के अनुसार शहर ही नहीं बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी बच्चे गेम के लती हो रहे हैं। जिले में पांच में से तीन बच्चों को ऑनलाइन गेमिंग की लत है। परंतु कुछ बच्चे इसके बहुत ज्यादा लती हो गए हैं। बच्चे फ्री फायर, बीजीएमआई और अब इन खतरनाक टास्क वाले गेम्स में अपनी सुध-बुध खो रहे हैं।
मोबाइल छीनने पर बच्चे हिंसक हो रहे हैं। गेमिंग डिसऑर्डर के कारण बच्चों में अवसाद, चिंता और चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है। वे परिवार के बीच रहने के बजाए अकेला रहना पसंद करते हैं और जब कोई उनका अकेलापन भंग करता है तो वे सहन नहीं कर पाते हैं। इसके अलावा घंटों एक ही स्थिति में बैठने से बच्चों में मोटापा, आंखों की कमजोरी और कार्पल टनल सिंड्रोम (हाथों में दर्द) जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं। देर रात तक गेम खेलने से बच्चों का स्लिप साइकिल बिगड़ रहा है।
12 में से पांच मामले हुए ठीक
उत्थान संस्था की निदेशिका व चाइल्ड लाइन की पूर्व निदेशिका डॉ. अंजू वाजपेयी ने बताया कि उनके पास छह मामले आए हैं। इनमें से चार बच्चे काउंसलिंग के बाद काफी ठीक हो गए हैं। उन्होंने कहा कि किसी चीज की लत इतनी जल्दी नहीं छूटती है। इसके लिए बेहद संजीदा तरीके से काम करना होता है। उनके पास जब मामले आए तो उन्होंने सबसे पहले माता-पिता की काउंसलिंग की। इसके बाद बच्चों की अकेले काउंसलिंग की। शुरुआत में बच्चे उनके प्रति भी गुस्सैल रवैया अपनाए रहे, लेकिन काउंसलिंग से वे सहज होते गए। इसके बाद माता-पिता और बच्चों की साथ-साथ काउंसलिंग की गई। अब चारों बच्चे काफी ठीक हैं, मोबाइल का उपयोग कम और आवश्यकता अनुसार करते हैं। माता-पिता व परिवार के अन्य सदस्य बच्चों के प्रति स्नेह व प्रेम का वातावरण बनाए रखते हैं और उन्हें समय देते हैं। इसी तरह मनोचिकित्सक दिव्या मंगला, विक्रम भारती ने बताया कि उनके पास भी ऐसे 150 से ज्यादा मामले हैं। इसमें से बेहद छह गंभीर हैं और उनकी काउंसलिंग की जा रही है। मनोचिकित्सक के अलावा इकाई की ओर से भी बच्चों की काउंसलिंग की जा रही है। एक बच्चा बिल्कुल ठीक हो गया है।