शादीपुर में गुरुकुल के पास बंद पड़ी फैक्टरी में केंद्रीय उर्वरक मंत्रालय व जिला कृषि एवं कल्याण विभाग की संयुक्त टीम ने छापा मारा। इस दौरान फैक्टरी में कृषि में प्रयोग होने वाले नीम कोटेड यूरिया के करीब 2800 बैग मिले। फैक्टरी में एक ट्रैक्टर-ट्राली व पिकअप गाड़ी भी मिली। इन दोनों वाहनों में भी यूरिया के कट्टे भरे हुए थे। टीम ने यूरिया को अपने कब्जे में लेकर फैक्टरी सील करके थाना सदर यमुनानगर में शिकायत दी। पुलिस मामले की जांच कर रही है। वहीं विभाग की इस छापामारी के बाद जिले की ज्यादातर प्लाईवुड फैक्टरियां बंद रही।
जिस फैक्ट्री से यह यूरिया मिला है, वह लंबे समय से बंद पड़ी है। इसमें पुरानी मशीनरी, लोहे का सामान व पशु खल की बोरियां पड़ी है। इसमें ही बने एक शेड में यूरिया के बैग रखे मिले। कृषि विभाग के अधिकारी व पुलिस इस फैक्टरी में कई घंटे तक रहे, लेकिन वह यह पता नहीं लगा सके कि यह फैक्टरी किसके नाम पर है। किसके कहने पर फैक्टरी में यूरिया उतारा जा रहा था। अधिकारियों की तरफ से थाने में जो शिकायत दी गई है उसमें भी फैक्टरी संचालक का नाम नहीं है। कहा तो यह भी जा रहा है कि सब्जी मंडी के एक आढ़ती की फैक्टरी है। फैक्टरी में जो यूरिया मिला है उनके बैग पर उत्तर प्रदेश के कानपुर की फैक्टरी का नाम है। जबकि कानपुर का यूरिया जिले में नहीं आता। ऐसे में माना जा रहा है कि यूरिया की यह खेप यूपी से ही आई होगी। खास बात यह है कि उत्तर प्रदेश व हरियाणा के बॉर्डर पर पुलिस नाका लगता है। वहां पर भी किसी ने यूरिया से भरे वाहनों की जांच नहीं की। 2800 बैग का बॉर्डर पार करके जिले में आना मायने रखता है। हो सकता है जो स्टॉक मिला है इसमें से काफी अन्य जगहों पर सप्लाई भी कर दिया हो। अधिकारियों को यह भी पता चला कि जिस व्यक्ति की यह फैक्टरी है उसका एक गोदाम छछरौली हाईवे से कैल जा रहे रोड पर भी है। परंतु वहां पर ताला लगा मिला। अधिकारियों ने बताया कि यदि ताला नहीं खोला गया तो इसे तोड़ कर अंदर जांच की जाएगी। कृषि विभाग के उप निदेशक डॉ. प्रदीप मिल ने बताया कि यूरिया की तस्करी करने पर एक साल में करीब 12 एफआईआर हो चुकी हैं।
कृषि विभाग के जॉइंट डायरेक्टर एग्रीकल्चर (क्वालिटी) डॉक्टर मंजीत नैन ने बताया कि यह यूरिया किसका था इसकी जांच पुलिस करेगी। फैक्टरी में जो यूरिया मिला है वह यूपी से सप्लाई किया गया होगा। बैग पर जो मार्का है वह कानपुर का है। शनिवार को भी कई प्लाईवुड फैक्टरियों में जाकर जांच की थी। जहां से यूरिया के तीन सैंपल लिए गए थे।
-
यूरिया से बनाते हैं ग्लू
प्लाईवुड फैक्टरियों में यूरिया से ग्लू बनाया जाता है जिससे प्लाई को चिपकाया जाता है। परंतु ग्लू बनाने के लिए सरकार ने टेक्निकल ग्रेड यूरिया अलग से बनाया हुआ है। इसके 50 किलोग्राम के एक बैग की कीमत करीब 3000 रुपये है। जबकि खेती में प्रयोग होने वाले नीम कोटेड यूरिया का एक बैग 300 रुपये से भी कम है। इसलिए प्लाईवुड फैक्टरियों में बड़े स्तर पर ग्लू के लिए नीम कोटेड यूरिया की तस्करी होती है। नीम कोटेड यूरिया के एक बैग से करीब 2700 रुपये की बचत फैक्टरी संचालक को होती है। पहले खेती में सामान्य यूरिया इस्तेमाल होता था। इसकी तस्करी रोकने के लिए केंद्र सरकार ने इसमें नीम मिलाया था। फिर भी इसकी तस्करी रूकने का नाम नहीं ले रही। तस्करी को रोकने के लिए ही कृषि विभाग ने जिले के करीब 750 प्राइवेट डीलरों को करीब पांच माह से नीम कोटेड यूरिया की सप्लाई नहीं दी है। अब किसानों को फसलों के लिए पैक्स केंद्रों के माध्यम से यूरिया दिया जा रहा है।