जिले के नौगवां जागीर खान गांव के राजकीय प्राथमिक पाठशाला में पढ़ाने के लिए दो शिक्षक नियुक्त हैं, लेकिन पढ़ने के लिए एक भी छात्र नहीं है। लिहाजा दोनों शिक्षक रोज स्कूल आते हैं और चले जाते हैं। यही नहीं, स्कूल में मिड डे मील बनाने के लिए कुक भी तैनात है। अब इस स्कूल को बंद करने की कवायद चल रही है।
साल 1972 में बने इस सरकारी प्राइमरी विद्यालय में कई वर्षों से विद्यार्थियों की कमी है। ढाई साल पहले तीन बच्चे होते थे। बाद में यह भी निजी स्कूलों में चले गए। सादिक नाम का एक बच्चा ढाई साल से अकेले पढ़ने आता था। अब उसका 134-ए के तहत निजी स्कूल में दाखिला हो गया है। दो माह पहले उसने भी स्कूल आना छोड़ दिया। एक बच्चे के लिए मिड डे मील भी बनता था। इसके लिए एक कुक भी रखा था। बच्चे के स्कूल छोड़ने के बाद से कुक भी रोज आता है और चला जाता है।
गांव वाले निजी स्कूलों में पढ़ा रहे बच्चे : सरपंच
गांव के सरपंच राजेश कुमार का कहना है कि गांवों के लोग यमुनानगर और जगाधरी के निजी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं। बच्चों को लाने ले जाने के लिए करीब 12 बसें रोजाना शहरों से आती हैं। कुछ लोगों के बच्चे पड़ोस के गांव नाभ स्थित प्राइमरी स्कूल में पढ़ने जाते हैं। नाभ का स्कूल आबादी से आधा किमी दूरी पर है। जबकि नौगवां जागीर खान गांव का स्कूल एक किमी दूर है। हालांकि, नाभ के स्कूल में भी बच्चों की संख्या बहुत कम है।
ढाई साल पहले जब मेरा यहां ट्रांसफर हुआ था तो उस समय पांच बच्चे इस स्कूल में पढ़ते थे। बच्चों की संख्या बढ़ाने की खूब कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। एक-दूसरे की देखा-देखी अभिभावक अपने बच्चों को शहर के निजी स्कूलों में पढ़ने भेज रहे हैं। एक साल से एक बच्चे को पढ़ा रहे थे। इस बारे में आला अधिकारियों को भी जानकारी है। महिला टीचर को डेपुटेशन पर भेज दिया गया है। मुझे भी बीएलओ का काम दिया गया है।
- सोनू देशवाल, शिक्षक, राजकीय प्राथमिक पाठशाला, नौगवां जागीर खान गांव
स्कूल में बच्चों के नहीं होने की कई वजहें हैं। सबसे बड़ी वजह अभिभावकों का अपने बच्चों का निजी स्कूलों में दाखिला दिलवाना है। इस सत्र में बच्चों का इंतजार किया गया। अब कोई दाखिला नहीं हुआ तो इसे बंद करने की चिट्ठी भेज दी गई है। स्टाफ का ट्रांसफर कर दिया गया है।
- मदन चोपड़ा, जिला मौलिक शिक्षा अधिकारी