तीन कृषि कानूनों के विरोध में मंगलवार को भारतीय किसान यूनियन के बैनर तले किसानों ने लघु सचिवालय में प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान किसानों ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। प्रदर्शन कर रहे किसानों का ज्ञापन लेने के लिए एसडीएम दर्शन लाल पहुंचे, लेकिन किसानों ने उन्हें ज्ञापन देने से मना कर दिया। इसके बाद डीसी मुकुल कुमार ज्ञापन लेने पहुंचे। किसानों ने डीसी को राष्ट्रपति के नाम संबोधित ज्ञापन सौंपा। किसानों का कहना था कि अब उन्हें प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री पर भरोसा नहीं है, इसलिए वे डीसी के माध्यम से राष्ट्रपति को ज्ञापन भेज रहे हैं।
भाकियू जिला प्रधान सुभाष गुर्जर की अध्यक्षता में काफी संख्या में किसान जगाधरी अनाजमंडी गेट पर एकत्रित हुए। यहां से प्रदर्शन करते हुए किसान लघु सचिवालय के अंदर गए। यहां डीसी ऑफिस के सामने किसानों ने सरकार विरोधी नारेबाजी की। सुभाष गुर्जर ने कहा कि किसानों के खिलाफ जो तीन कृषि कानून लागू किए गए, उनको सरकार जल्द से जल्द रद्द किया जाए। गिरफ्तार किए गए किसानों को तुरंत प्रभाव से रिहा किया जाए। जो किसानों के खिलाफ 107/51 के मुकदमे दर्ज किए गए, उन मुकदमों को वापस लिया जाए। जो सरकार द्वारा आंदोलन के दौरान सड़कों को तोड़कर सरकारी प्रॉपर्टी को नुकसान पहुंचाया गया। उसे जिम्मेदार अधिकारी व नेताओं के खाते से वसूल किया जाए।
उन्होंने कहा कि किसानों के हितों की बात करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आजकल बनारस में दिवाली मना रहे हैं। उन्हें किसानों की कोई चिंता नहीं है। लाखों किसान सड़कों पर अपना हक मांगने के लिए पड़े हुए हैं। उन्होंने विधायक सोमबीर सांगवान का भी स्वागत किया कि जो किसानों के आंदोलन में आपने पद से इस्तीफा देकर आए हैं। उन्होंने कहा कि यह आंदोलन सरकार के पतन का कारण होगा। प्रदर्शन में बलिासपुर प्रधान सुखदेव सिंह, छछरौली प्रधान मोहनलाल, सरस्वती नगर प्रधान बजिंद्रसिंह राणा, करणवीर, जसवीर, सुभाष, सतबीर सिंह, जसविंद्र सिंह, नायाब सिंह, किरणपाल, निरंजन सिंह, महिंद्र सिंह सुबे सिंह, पाला राम आदि किसान मौजूद रहे।
प्रधान सुभाष गुर्जर ने कहा कि किसानों को प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री पर भरोसा नहीं है। इसलिए राष्ट्रपति द्वारा इन सभी मुख्य मांगों की विशेष जांच कराई जाए। उन्होंने कहा काले कानूनों की मदद में दिल्ली कूच करने वाले किसानों को सरकार ने रात को उठाकर जेलों में काली कोठरी में डालकर रात को काले कम्बलों में सोने पर मजबूर किया। किसान इस को कभी भुला नहीं पाएंगे। सरकार को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।