यमुनानगर। महाशिवरात्रि पर्व पर देवों के देव महादेव के मंदिर में जलाभिषेक करने के लिए श्रद्धालुओं में भारी उत्साह है। जिले में वैसे तो सैकड़ों शिवालय और मंदिर हैं लेकिन यहां पांच ऐसे शिव मंदिर हैं, जो पौराणिक और वैदिक महात्म्य के कारण श्रद्धालुओं के आस्था का केंद्र हैं। इनमें स्वयंभू शिवलिंग भी शामिल है। मान्यता है कि इन पांचों मंदिरों में महाशिवरात्रि और सावन के महीने में महादेव का अभिषेक करने से सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं।
भाटली का शिव मंदिर
अंबाला रोड गांव भाटली (भटौली) स्थित शिव मंदिर में जिले के प्राचीन मंदिरों में से एक है। इसकी विशेषता यह है कि यहां पर स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है। मान्यता है कि अज्ञातवास में पांडवों ने यहां तपस्या की और प्रसन्न होकर भगवान शिव यहां पर आए थे। तभी से ज्योति स्वरूप से यहां स्वयंभू शिवलिंग है। मंदिर प्रांगण में वह वटवृक्ष आज भी इसका साक्षी बताया जाता है जिसके ठीक सामने स्वयंभू शिवलिंग है।
पातालेश्वर महादेव ज्योतिर्लिंग मंदिर
बुड़िया के गांव दयालगढ़ में भगवान शिव का पौराणिक मंदिर है। मान्यता है कि भगवान शिव की असीम कृपा से यहां स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है। कई वर्ष पहले पुरी धाम से आए जगत गुरु शंकराचार्य निरंजन देव तीर्थ मंदिर पहुंचे थे। यहां उन्होंने भगवान शिव की आराधना की और बताया कि यह ज्योतिर्लिंग है। मान्यता है कि जब क्षेत्र में बारिश न होने पर लोग यहां बावली के कुएं से जल ले जाकर स्वयंभू शिवलिंग कुंड में भरते थे। जब कुंड ऊपर तक भर जाता था, तो बारिश होने लगती थी।
भगवान नारायण की तपस्थली आदिबद्री श्रीकेदारनाथ तीर्थहिमाचल के पांवटा साहिब और हरियाणा के यमुनानगर दोनों जगह से करीब 40 किलोमीटर दूरी पर स्थित आदिबद्री तीर्थ स्थल पर श्री केदारनाथ मंदिर है। यह मंदिर महाभारत काल का है और यहां पांडव भी आए थे। मान्यता है कि यह वैदिक पौराणिक तीर्थ स्थल है। यहां पर स्वयं भगवान नारायण ने तपस्या की थी। यहीं से उन्होंने श्रीमद्भागवत पुराण की संरचना करवाई तभी से यह स्थान तीर्थ स्थल के नाम से जाना जाता है। करीब 5118 साल पहले द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने यहां पर एक शंख रखा था जो अभी भी यहां पर मौजूद है। यहां स्थापित स्वयं भू शिवलिंग का अभिषेक करने से सभी कष्ट दूर होते हैं।
यहां स्वयंभू शिवलिंग में हैं त्रिदेव की शक्तियां
हिमाचल प्रदेश के पांवटा से पहले कलेसर जंगल के पास स्थित श्री कालेश्वर महादेव मठ प्राचीनतम और पौराणिक है। मान्यता है कि इस मठ में स्वयं भगवान शिव स्वयंभू लिंग के रूप में विराजमान हैं। यह शिवलिंग बहुत अद्भुत है जिसके मूल में ब्रह्मा जी की नाभि, मध्य में विष्णु जी का चक्र और ऊपर भगवान शिव विराजमान हैं। यहां पहाड़ पर भगवान शंकर और मां पार्वती की गुफाएं बनी हुई हैं। यहां पर स्थित पहाड़ियों को द्रोण घाटियां भी कहते हैं। मान्यता है कि गुरु द्रोणाचार्य ने पांडवों को यहां पर द्रोण विद्या यानी परमाणु शस्त्रों का ज्ञान दिया था।
अर्जुन ने यहां की थी भगवान शिव की पूजा
बुड़िया के पास गांव अमादलपुर में देश का सूर्य मंदिर स्थित है। प्राचीन सूर्यकुंड मंदिर अमादलपुर में हजारों साल पहले यक्ष युद्ध के बाद पांडव यहां कुछ समय के लिए आए थे। उस समय अर्जुन ने कैलाश पर्वत जाकर भगवान शिव को प्रसन्न करके पाशुपतास्त्र और रूपेश्वर शिवलिंग प्राप्त किया था। अर्जुन इस शिवलिंग को लेकर अमादलपुर में आ गए थे। बताया जाता है कि पांडवों ने रूपेश्चा शिवलिंग को प्रतिष्ठित करने के लिए यहां मंदिर का निर्माण किया था। इस शिवलिंग में भगवान शिव का प्रतिरूप है। इसलिए इसे रूपेश्वर भी कहा जाता है। मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडव यहां रुके थे।