संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। अगर समय पर बीमारी की पहचान हो जाए और इलाज का खर्च सरकार उठाए, तो किसी बच्चे का भविष्य अंधकारमय होने से बचाया जा सकता है। भारत सरकार की महत्वाकांक्षी योजना राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) सैकड़ों बच्चों के जीवन में उम्मीद की रोशनी बनकर उभरी है। इस योजना से न केवल बच्चों की बीमारियों की समय रहते पहचान की गई, बल्कि महंगे इलाज भी मुफ्त में करवाए गए।
इस साल दो विशेष मामले ऐसे आए जिनमें विभाग ने अपने खर्च पर बच्चों का उपचार करवा कर उन्हें नया जीवनदान दिया। पहले मामले में एक बच्ची में गंभीर श्रवण समस्या पाई गई। आरबीएसके टीम द्वारा प्रारंभिक जांच के बाद बच्ची को पीजीआई चंडीगढ़ भेजा गया, जहां बेरा टेस्ट और अन्य जांचों के उपरांत कोक्लीयर इंप्लांट की सिफारिश की गई। लगभग छह लाख 12 हजार रुपये की लागत वाला यह ऑपरेशन किया गया। सर्जरी के बाद वह अब सामान्य बच्चों की तरह सुनने और सीखने की ओर बढ़ रही है।
दूसरे मामले में एक बच्चे में वृद्धि हार्माेन की गंभीर कमी पाई गई। आरबीएसके के निर्देशानुसार उसे पीजीआई चंडीगढ़ रेफर किया गया, जहां विशेषज्ञों ने नियमित इंजेक्शन की सलाह दी। लगभग सात लाख 20 हजार रुपये की लागत वाला यह उपचार भी स्वास्थ्य विभाग ने वहन किया। नोडल ऑफिसर उप सिविल सर्जन डॉ. बुलबुल कटारिया ने बताया कि आरबीएसके कार्यक्रम का उद्देश्य 0 से 18 वर्ष तक के बच्चों में जन्मजात दोष, बीमारियां, पोषण संबंधी कमियां और विकासात्मक देरी यानी 4डी की जांच कर समय पर उपचार सुनिश्चित करना है।
उन्होंने बताया जिले में इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए 11 मोबाइल हेल्थ टीमें आंगनबाड़ी केंद्रों और सरकारी स्कूलों में नियमित रूप से बच्चों की स्वास्थ्य जांच कर रही हैं। गंभीर मामलों को जिला प्रारंभिक हस्तक्षेप केंद्र (डीईआईसी) और तृतीय स्तरीय चिकित्सा संस्थानों जैसे पीजीआई में रेफर किया जाता है। आरबीएसके के तहत वित्त वर्ष 2025-26 में जिले के कुल 69 बच्चों की विभिन्न गंभीर बीमारियों से संबंधित सर्जरी करवाई गई।
इनमें जन्मजात हृदय रोग, कोक्लीयर इंप्लांट समेत अन्य गंभीर बीमारियां शामिल हैं। उन्होंने बताया कि जिले में सात स्वास्थ्य शिविर आयोजित किए गए, जिनमें 932 बच्चों की जांच की गई और 404 बच्चों को उपचार दिया गया। सरकारी स्कूलों में नेत्र जांच शिविर लगाकर लगभग 2000 बच्चों को मुफ्त में चश्में प्रदान किए गए। आंगनबाड़ी केंद्रों में 71,952 और सरकारी स्कूलों में 91,054 बच्चों की जांच की गई।