संवाद न्यूज एजेंसी
जगाधरी। पंडित रमन वत्स के अनुसार सनातन धर्म में एकादशी का बड़ा महत्व है। एक माह में दो बार एकादशी का व्रत किया जाता है, एक बार शुक्ल पक्ष में तो दूसरी बार कृष्ण पक्ष में एकादशी का व्रत रखा जाता है। पद्मपुराण में भी एकादशी का बहुत महत्व बताया गया है। इनमें से ही षटतिला एकादशी है।
भगवान विष्णु को समर्पित इस एकादशी का विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो लोग षटतिला एकादशी पर भगवान विष्णु के साथ मां लक्ष्मी की पूजा करते हैं। उन्हें सुख, शांति, समृद्धि, धन और यश का वरदान प्राप्त होता है। पंडित रमन वत्स ने बताया कि हिंदी पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि का प्रारंभ 24 जनवरी को शाम 7:25 बजे से होगा।
वहीं एकादशी तिथि का समापन 25 जनवरी रात 8:31 बजे होगा। ऐसे में उदयातिथि के अनुसार, षटतिला एकादशी शनिवार 25 जनवरी को मनाई जाएगी। पंडित रमन वत्स ने बताया कि षटतिला एकादशी के दिन व्रती ब्रह्म मुहूर्त में उठे। इसके बाद पूरे शरीर पर सफेद तिल का उबटन लगाकर पानी में तिल मिलाकर स्नान करें।
स्नान इत्यादि के बाद पीले वस्त्र धारण कर पूजन की तैयारी करें। इस दौरान भगवान विष्णु व मां लक्ष्मी की पूजा करें। इसके बाद एकादशी व्रत का संकल्प लें। अब भगवान विष्णु व मां लक्ष्मी को फूल, दीप, धूप, फल, पेठा, सीताफल, सुपारी, नारियल अर्पित करें। इसके बाद, भगवान विष्णु को खिचड़ी का भोग लगाएं और मंत्र जाप करें।
पंडित रमन वत्स के अनुसार एकादशी के दिन तुलसी पर जल नहीं चढ़ाना चाहिए और न ही तुलसी के पत्ते तोड़ने चाहिए। मान्यता है कि माता तुलसी, भगवान विष्णु के निमित्त निर्जला व्रत करती हैं और इन सभी कार्यों से उनके व्रत में विघ्न पड़ता है। वहीं, एकादशी के दिन तुलसी में कलावा जरूर बांधना चाहिए।
इस उपाय से जीवन में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। इस दिन तिल का दान करने से कुण्डली में शनि के दुष्प्रभाव कम होते हैं। तिल के लड्डू बना जरूरतमंदों में बांट ने से साधक को अक्ष्य पुण्य की प्राप्ति होती है। परिवार व जीवन से दुख, दरिद्रता का नाश होता और समृद्धि आती है।