संवाद न्यूज एजेंसी
व्यासपुर। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान व्यासपुर आश्रम में आयोजित साप्ताहिक सत्संग कार्यक्रम में साध्वी रबिया भारती ने जीवन में आलोचना की प्रवृत्ति और सकारात्मक सोच के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत आलोचना न तो मन को शांति देती है और न ही परिस्थितियों में कोई सकारात्मक बदलाव लाती है। इसके विपरीत, यह व्यक्ति के अहं, स्वाभिमान और आत्मबल को कमजोर कर देती है।
साध्वी ने दैनिक जीवन के उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि बच्चों के कम अंक आने पर डांट-फटकार करने से उनके परिणाम नहीं सुधरते, और मनचाहा भोजन न मिलने पर उसकी आलोचना करने से स्वाद नहीं बदलता। बीती परिस्थितियों की आलोचना करके उन्हें बदला नहीं जा सकता और न ही इससे भविष्य सुरक्षित होता है। आलोचना अक्सर दोषारोपण का रूप ले लेती है, जिससे सुधार के बजाय प्रतिशोध और नकारात्मक भावनाएं जन्म लेती हैं।
उन्होंने महाभारत के महान योद्धा महारथी कर्ण का उदाहरण देते हुए बताया कि निरंतर आलोचना ने उनके भीतर घृणा और प्रतिशोध की भावना को बढ़ाया। राजा न होने के कारण कर्ण को बार-बार अपमानित किया गया, जिससे उनकी विवेक शक्ति प्रभावित हुई। युद्ध के दौरान जब राजा शल्य ने सारथी बनकर उनकी आलोचना जारी रखी, तो कर्ण का मनोबल टूट गया और अंततः वह वीरगति को प्राप्त हुए।
साध्वी रबिया ने कहा कि जीवन और रिश्तों को संवारने के लिए आलोचना नहीं, बल्कि प्रेम, समझ और सकारात्मक प्रेरणा आवश्यक है। एक-दूसरे का सहयोग करते हुए आगे बढ़ना ही सच्ची सफलता है और यही ईश्वर को भी प्रिय है। सत्संग में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
सत्संग सुनने के लिए पहुंचीं महिलाएं। आयोजक