जगाधरी। कभी कोरोना काल की मंदी तो कभी लेबर व अन्य संसाधनों की कमी सहित नए नियमों में हांफते जगाधरी के बर्तन उद्योग के लिए कपालमोचन मेला संजीवनी साबित हुआ। मेले से बर्तन खरीद कर ले जाने की दशकों पुरानी परंपरा है, जिसे पूरा कर मेले में पंजाब सहित अन्य प्रदेशों के लाखों श्रद्धालु बर्तन खरीद कर ले गए। इस तरह पांच दिन के मेले में करीब आठ करोड़ रुपये के बर्तन बिकने का अनुमान है।
बता दें कि 23 से 27 नवंबर तक कपालमोचन व आदिबद्री क्षेत्र में अंतरराज्यीय मेला लगा। मेले के पांच दिन में आठ लाख श्रद्धालु आए, ऐसा प्रशासन का अनुमान है। खासकर पंजाब के विभिन्न जिलों के श्रद्धालु मेला क्षेत्र में लगी सैकड़ों बर्तन दुकानों सहित कपालमोचन से वापस लौटते समय जगाधरी में रुककर यहां की दुकानों व बाहर फड़ियों से बर्तन खरीद कर ले गए। मेले के आखिरी दिन सोमवार को जगाधरी शहर के अलावा साथ लगते एनएच-73ए जगाधरी-पांवटा पर भी सनातन धर्म (मटका) चौक से जगाधरी बस स्टैंड तक दोनों ओर बर्तनों की फड़ियाें पर श्रद्धालुओं ने बर्तन खरीदे। सुबह आठ बजे से शाम चार बजे तक यह सिलसिला रहा। श्रद्धालुओं के लिए विभिन्न संस्थाओं व सभाओं ने हाईवे किनारे ही लंगर पंडाल भी लगाए, जिससे दिनभर यहां मेले सा नजारा रहा।
दो लाख ने 300-400 रुपये के खरीदे तो भी बिक्री छह से आठ करोड़
प्रशासन की माने तो मेले में आठ लाख श्रद्धालु आए। इनमें दो लाख श्रद्धालु भी औसत 300 से 400 रुपये के बर्तन खरीद ले गए तो भी कुल बर्तनों की बिक्री छह से आठ करोड़ बनती है। मेले के पहले दो दिन मेला क्षेत्र में लगी दुकानों में बर्तनों की खरीद नाममात्र थी, पर आखिरी तीन दिनों में मेला क्षेत्र में भी लाखों रुपये के बर्तनों की खरीद हुई। अंतिम दिन जगाधरी में भी करीब 50 हजार श्रद्धालु सुबह से शाम तक आते रहे और बर्तन खरीद लौटते गए। उद्योगपति कृपाल सिंह ने बताया कि हर साल दिवाली की तरह कपालमोचन मेले का इंतजार रहता है, क्योंकि इसमें आने वाले खासकर पंजाब के श्रद्धालु एक बर्तन जरूरत खरीद ले जाते हैं। इस बार भी उन्होंने ऐसा किया, जिससे व्यापारियों के लिए दिवाली की बर्तन बिक्री की रही कसर पूरी हुई।
150 साल पहले लगा हाथ से बर्तन बनाने का काम-
बूड़िया के राजा रतन अनमोल ने करीब 150 साल पहले जगाधरी में हाथ से बर्तन बनाने का काम शुरू कराया था। धीरे-धीरे व्यापार में तरक्की हुई और बड़ी इंडस्ट्री स्थापित हो गई। पहले यहां बने पीतल फिर स्टील व अन्य धातुओं के बर्तनों की चमक देश विदेश में होने लगी, जिस पर जगाधरी का नाम मेटल नगरी पड़ गया। पुराने जगाधरी 392 एकड़ में फैला है। जहां करीब एक हजार बर्तन उद्योग की छोटी-बड़ी इकाइयां हैं। बहुत से लोगों ने घर में ही लघु उद्योग लगा रखा है। इसके बाद सरकार के मानकपुर में बनाए औद्योगिक क्षेत्र में भी बर्तन उद्योग की इकाइयां लग गईं।