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कैसे बढ़ें छात्र व कोर्स? सरकारी कॉलेजों के पास न अपना भवन न स्टाफ

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यमुनानगर। कॉलेजों में चल रहे यूजी (अंडर ग्रेजुएट) और पीजी (पोस्ट ग्रेजुएट) के दाखिलों में युवाओं का रुझान सरकारी से अधिक एडेड और सेल्फ फाइनेंस कॉलेजों में है। इसकी बड़ी वजह सरकारी कॉलेजों में सुविधाओं और स्टाफ की कमी है। ये देख ग्रामीण क्षेत्रों से काफी युवा नजदीक में कम खर्च के कोर्स वाले सरकारी कॉलेज होने के बाद भी एडेड और सेल्फ फाइनेंस कॉलेजों के अधिक खर्चीले कोर्स की ओर रुख कर रहे हैं। अमर उजाला ने जमीनी हकीकत जानी तो पाया कि जिले के पांच सरकारी कॉलेजों में से दो के पास अपने तक भवन नहीं हैं। दोनों कॉलेजों में स्टाफ से लेकर मौजूदा कोर्स की काफी सीटें भी रिक्त हैं। असुविधाओं के बीच नए कोर्स भी नहीं मिले हैं।
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उल्लेखनीय है कि तीन साल से सरस्वती नगर और दो साल से प्रतापनगर का सरकारी कॉलेज नजदीक के राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक स्कूल में चल रहे हैं। दोनों जगह यूजी में बीए और बीकॉम, दो ही कोर्स हैं जबकि पीजी का कोई कोर्स नहीं हैं। सरस्वती नगर में बीए की 160 व बीकॉम की 80 सीटें हैं, वहीं प्रतापनगर में बीए की 60 और 40 सीटों के साथ बीकॉम इसी वर्ष चालू हुआ है।
कॉलेज में संसाधनों की कमी के संबंध में कॉलेज स्टाफ ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि दोनों कॉलेजों के लिए सरकारी स्कूलों में मिले कमरों की संख्या ऑफिस वर्क और क्लासेस लगाने को कम हैं। स्टाफ भी पूरा नहीं है। ऐसे में चाहकर भी नए कोर्स की मांग नहीं कर पाते हैं। उधर इन कॉलेजों के भवन के लिए जमीन चिह्नित करने से लेकर अन्य औपचारिकताएं संबंधित विभाग द्वारा दो से तीन वर्षों बाद भी पूरी नहीं की गई।
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एक रूम में चल रहा कंप्यूटर और कॉमन रूम
कॉलेज के संसाधनों पर नजर डालें तो वह दयनीय स्थिति में हैं। सरस्वती नगर कॉलेज के आठ तो प्रतापनगर कॉलेज के लिए छह कमरे मिले हैं। इनमें एक-एक कमरे दो-दो कामों में इस्तेमाल किया जा रहा है। जैसे एक ही कमरे में कॉमन रूम और कंप्यूटर रूम तो एक ही कमरे में लाइब्रेरी व स्टाफ रूम बने हैं। दोनों कॉलेजों में स्टाफ भी कामचलाऊ स्थिति में है। एक ओर प्रतापनगर में छछरौली के सरकारी कॉलेज से डेप्यूटेशन पर पांच लोगों का स्टाफ है तो दूसरी ओर सरस्वतीनगर में महज चार लोगों का स्टाफ है। दोनों जगह प्रिंसिपल से लेकर प्रोफेसर, क्लर्क, प्यून जैसे पद रिक्त हैं। साथ ही लाइब्रेरी, लैब, खेल जैसी अन्य सुविधाएं भी नहीं हैं।
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युवतियों को ज्यादा परेशानी 12वीं के बाद छोड़ देतीं हैं पढ़ाई
दोनों सरकारी कॉलेज में भवन और अन्य सुविधाएं और स्टाफ की कमी देख क्षेत्र के युवाओं का यहां के कम खर्च के कोर्स होने के बावजूद रूझान कम हो रहा है। यहां मौजूद बीए, बीकॉम की पूरी सीटें भी नहीं भर पाती हैं। उन्हें दूसरे ब्लॉक के सरकारी कॉलेज या एडेड और सेल्फ फाइनेंस कॉलेजों में अधिक खर्चीले कोर्स करने पड़ रहे हैं, पर ये कॉलेज दूरस्थ स्थानों पर होने के चलते ग्रामीण क्षेत्र की अधिकांश युवतियों ऐसा न कर 12वीं बाद उच्च शिक्षा से वंचित रह जाती हैं।
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