संवाद न्यूज एजेंसी
जगाधरी। हनुमान गेट स्थित दिव्य ज्योति जागृति संस्थान आश्रम में रविवार को साप्ताहिक सत्संग हुआ। आशुतोष महाराज की शिष्या साध्वी सरस्वती भारती ने कहा कि निराकार शक्ति परमपिता परमात्मा कष्ट व पीड़ा से बिलखती जीवात्माओं की पुकार सुनकर साकार रूप में धरती पर आते हैं, तो उनका स्वभाव एक माता की तरह करुणा व वात्सल्य से भरपूर होता है।
साध्वी ने कहा कि निराकार शक्ति की पूजा करना बहुत सरल है। चूंकि निराकार स्वरूप परमात्मा से हमारे अहंकार और मन के विकारों को कोई क्षति नहीं पहुंचती है। वहीं, दूसरी ओर जब वह परम शक्ति साकार स्वरूप धारण करके हमारे जैसे बन कर आते हैं, तो उनकी पूजा व महिमा का वर्णन करना सरल नहीं है। उनकी शरणागत होने से मन के विकार सहज ही समाप्त हो जाते हैं और अहंकार टूट जाता है। गुरु को ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश की संज्ञा दी जाती है, चूंकि वे अपनी शरण में आने वाले शिष्य का आध्यात्मिक निर्माण करके उसके भीतर देवत्व के गुणों का संचार करते हैं। गुरु की महिमा को शब्दों में न तो बोला जा सकता है न ही लिखा जा सकता है। गुरु की महिमा अनंत है।
गुरु अपने शिष्य के जीवन में पिता की तरह सदैव उसका संरक्षण करते हैं, माता बन कर करुणा व वात्सलय लुटाते हैं और सखा बनकर आने वाली परिस्थितियों के साथ भी लड़ते हैं। गुरु वो शक्ति है जो शिष्य को परीक्षा की अग्नि में डालते हैं लेकिन जलने नहीं देते हैं। शिष्य को अंतर्घट के समुद्र की गहराई में ले जाते हैं, लेकिन डूबने नहीं देते हैं। शिष्य को सफलता के सर्वोच्च शिखर तक ले जाते हैं, लेकिन उसके पांव धरती से उखड़ने नहीं देते हैं। उन्होंने कहा कि जन्म-मृत्यु के चक्रव्यूह में फंसी जीवात्मा स्वयं केवल अपने पुरुषार्थ द्वारा कर्म संस्कारों से कभी मुक्त नहीं हो सकती है। जब तक गुरु अपने तपोबल का संबल प्रदान न करें, यह संभव नहीं है। एक साधक गुरु की कृपा से आध्यात्मिक ऊंचाइयों को प्राप्त कर लेता है।