गैस एजेंसी संचालक की गलती का खामियाजा जम्मू कॉलोनिवासी धर्मपाल को नौकरी
गंवाकर भुगतना पड़ा। धर्मपाल वह व्यक्ति है, जो पिछले पंद्रह दिन से
इंडस्ट्री एरिया स्थित कॉन्फेड गैस एजेंसी के चक्कर काट रहे हैं।
लेकिन आज
तक गैस नहीं मिली है। पंद्रह दिन से वह ड्यूटी पर नहीं जा पाया, जिससे
ठेकेदार ने उसे नौकरी से निकाल दूसरे व्यक्ति को रख लिया। इस तरह के कई
व्यक्ति हैं जो गैस न मिलने से या तो ड्यूटी पर नहीं जा पा रहे हैं या फिर
बिना सिलेंडर के घर वापस जाने पर घर वालों के गुस्से का सामना कर रहे हैं।
दरअसल एजेंसी की कागजी प्रक्रिया पूरी न होने से कई दिन से प्लांट से गैस
नहीं पहुंची।
सिलेंडर न मिलने से खफा लोगों ने मंगलवार को गैस एजेंसी के
सामने प्रदर्शन किया और अधिकारियों पर कई गंभीर आरोप लगाए। लोगों का कहना
था कि न तो उनकी बात को गैस एजेंसी स्थित कर्मचारी सुन रहे हैं और न ही
अधिकारी। अगर सिलेंडर न मिलने पर अधिकारी को शिकायत देने के लिए डीएफएससी
कार्यालय जाते हैं तो वहां पर कोई अधिकारी नहीं मिलता। उनका आरोप है कि
उनके हिस्से की गैस कालाबाजारी की जा रही है। इसमें अधिकारी भी एजेंसी
कर्मचारियों का साथ दे रहे हैं।
सही जानकारी भी नहीं देते
गैस
लेने पहुंचे आनंद मार्केट निवासी दीनानाथ, विकास, कन्हैया सिंह और अरविंद
का कहना है कि दो हफ्ते से एजेंसी के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन सिलेंडर
नहीं मिला। जब भी एजेंसी पर बैठे कर्मचारियों से यह पूछा जाता है कि गैस कब
आएगी तो उनका एक ही जवाब रहता है कि कल मिल जाएगी। जब अगले दिन आया जाता
है तो फिर वही बात दोहराई जाती है कि कल आना। उनका कहना है कि घर में खाना
बनाने के लिए गैस नहीं है और एजेंसी पर बैठे कर्मचारी उन्हें सही जानकारी
नहीं दे रहे हैं। प्रतिदिन आने जाने में 20 से 30 रुपये खर्च हो रहे हैं।
ऐसे में दस दिन में 200 से 300 रुपये आने जाने में ही खर्च कर दिए हैं।
उनका कहना है कि अधिकारी भी कोई सुनने वाला नहीं है, वहीं दर्शन लाल और रुप
मती का कहना है कि सिलेंडर न मिलने से एक सप्ताह से उनके घर चूहा नहीं जला
है। तीनाें समय का खाना बाजार से लाना पड़ रहा है।
सब्सिडी के लिए भटक रहा
गैस
एजेंसी पर पहुंचे दीनानाथ ने बताया कि उसने जो सिलेंडर लिए थे, अभी तक
उनकी सब्सिडी नहीं आई है। किसी से उधार लेकर 1200 रुपये का सिलेंडर लिया
था। एक माह हो गया है। लेकिन अभी तक उसके खाते में सब्सिडी की रकम नहीं आई
है। उनका कहना है कि जब भी एजेंसी कर्मचारियों से बात की जाती है उनकी ओर
से इस बारे में कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया जाता।