संवाद न्यूज एजेंसी
जगाधरी। सर्दी शुरू होने के साथ ही लोगों ने रजाइयां व कंबल बक्से से बाहर निकाल लिए हैं। परंतु अब रजाइयों की जगह कंबलों ने ले ली है। यही कारण है कि अब रजाई बुनकर व रूई पिनाई का काम बहुत ही कम हो गया है। पहले इन दिनों जहां बुनकरों पर रजाई बनवाने के लिए लोगों की भीड़ रहती थी। अब अधिकांश बुनकर दिनभर खाली बैठे रहते हैं।
कंबल का चलन शुरू होने के चलते रजाइयों का काम न के बराबर रह गया है। ऐसे में अधिकांश बुनकर यह काम छोड़ अन्य काम कर रहे हैं। एक जमाना था जब सर्दी की दस्तक होने पर रजाई भराई का काम जोर पकड़ लेता था। गर्म वस्त्रों की तरह रजाई की बिक्री भी खूब बिक्री होती थी, परंतु बदलते दौर में ट्रेंड बदल गया है।
अब ओढ़ने के लिए सैकड़ों किस्म के फैंसी कंबल व रेडीमेड रजाइयां बाजार में उपलब्ध है। इससे कपास की रजाई बुनकर व रूई पिनाई करने वालों का काम ठप सा हो गया है। पहले जहां लोगों की रजाइयां बुनने के लिए कारीगर दिन-रात काम करते थे। वहीं, अब पूरे दिन में इक्का-दुक्का ही लोग ही आते हैं।
शहरों में तो रजाई बुनाई और रूई पिनाई का काम बिल्कुल ही ठप हो गया है। पहले इन दिनों शहर के विभिन्न हिस्सों में 100 से ज्यादा बुनकर थे, लेकिन अब 20 से भी कम रह गए हैं। चूंकि कंबलों के चलन के कारण काम लगभग खत्म हो गया है, ऐसे में बुनकर अपना पुश्तैनी काम छोड़ अन्य काम करने लग गए हैं। अब शहर में इक्का-दुक्का ही रूई पिनाई वाले दिखाई देते हैं।
पहले पूरा परिवार करता था काम
बिहार के सासाराम के रहने वाले तौफिक ने बताया कि वह काफी साल से यह काम कर रहा है। उनके पूर्वज भी यही काम करते थे। सर्दियों में इतना काम होता था कि उन्हें बिल्कुल भी फुरसत नहीं मिलती थी। परंतु कंबल के ट्रेंड से 80 फीसदी काम खत्म हो गया है। तौफिक ने बताया कि शहर में तो काम लगभग समाप्त ही हो चुका है। उनके पास रजाई बनवाने आने वाले अधिकांश लोग ग्रामीण हैं। शहर में लोग कंबल और रेडीमेड रजाई लेना ज्यादा पसंद करते हैं। इसी तरह औरैया के राममेहर ने बताया कि पहले उनके परिवार के 12 लोग यही काम करते थे। इसी काम से उनका परिवार चलता था और पूरा साल काम रहता था। परंतु बदलते चलन में काम मंदा होता गया। धीरे-धीरे अन्य सदस्यों ने दूसरा काम करना शुरू कर दिया। अब वह केवल सीजन में यह काम करते हैं और इसके बाद मैट बनाते हैं।