संवाद न्यूज एजेंसी
साढौरा। दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान आश्रम में आयोजित साप्ताहिक सत्संग के दौरान साध्वी सुमन भारती ने एक साधक के जीवन में श्रद्धा का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि श्रद्धा आत्मा की वह सर्वश्रेष्ठ भावना है जो परमात्मा के निराकार स्वरूप को साकार करने में और साकार स्वरूप में निराकार को देखने में सक्षम है।
उन्होंने कहा कि एक श्रद्धावान हृदय ही ब्रह्मज्ञान का अधिकारी है, क्योंकि ब्रह्मज्ञान इस संपूर्ण सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ निधि है, जिसे धारण करने हेतु श्रद्धावान हृदय रूपी पात्र का होना आवश्यक है। एक ब्रह्मनिष्ठ संत की शरण में जब कोई जिज्ञासु आत्मा आती है तो गुरु उसकी जिज्ञासाओं का समाधान उसे प्रदान करते हैं।
शरण में आने वाली आत्मा के सभी दुख व पीड़ा गुरु अपनी कृपा द्वारा समाप्त कर देते हैं। एक अर्थार्थी को उनकी शरण में आने से ही सभी अभीष्ट कामनाओं की प्राप्ति हो जाती है, लेकिन जब एक ज्ञानी भक्त श्रद्धावान हृदय लेकर गुरु की शरण में आता है तो गुरु ऐसे विवेकी साधक को अपनी अभिव्यक्ति बनाकर उसे जन्म मरण के चक्रव्यूह से सदा के लिए मुक्त कर देते हैं।
फिर ऐसी श्रद्धावान आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं रहता, क्योंकि जब हृदय में श्रद्धा प्रकट होती है तो जीवन से सभी क्लेश और मन के विकारों को समूल नष्ट करके साधक को दिव्यता प्रदान करती है। जब साधक निरंतर गुरु के दिखाए हुए मार्ग पर चलते हुए ब्रह्मज्ञान की ध्यान साधना करता है तब उसके जीवन में कई तरह की परिस्थितियां आती हैं, लेकिन उन परिस्थितियों से वह साधक अपनी श्रद्धा और विश्वास का संबल लेकर सहज ही पार हो जाता है।
उन्होने कहा कि यह मानव मस्तिष्क का स्वभाव है कि उसमें जब एक भाव प्रबल होता है तो वह अन्य सभी भावों को प्रभावहीन कर देता है। जब हमारे भीतर श्रद्धाभाव जन्म लेता है तब अन्य सभी व्यर्थ एवं नकारात्मक भाव तिरोहित हो जाते हैं। श्रद्धा अपने साथ प्रेम, वात्सल्य, करुणा, धैर्य, आत्मसंयम, क्षमाशीलता और श्रेष्ठ आचरण जैसे गुणों को भी प्रकट करती है। श्रद्धा वर्षा के जल की तरह है, वह जिसका संग करती है वैसा ही रूप धारण कर लेती है।