मंगलवार को तापमान 42 डिग्री तक पहुंच गया। इस प्रचंड व चिलचिलाती गर्मी में पानी पीने के एक मिनट बाद भी गला सूखने लगा है। गर्मी के कारण ठंडे पानी की मांग बढ़ गई है। ऐसे में लोगों को मिट्टी के मटका (घड़ा) की याद आने लगी है। वहीं बाजार में प्राकृतिक एवं देसी फ्रिज यानी मटके व सुराही दुकानें सज गई हैं। मिट्टी के मटकों व सुराहियों का पानी फ्रिज की ठंडक को भी मात दे रहा है। इसे प्राकृतिक व देसी फ्रिज भी कहा जाता है।
ज्यों ज्यों पारा चढ़ रहा है, लोग गर्मी से राहत पाने का जतन करने लगे हैं। यूं तो पानी ठंडा करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक वाटर कूलर, फ्रिज सहित तमाम तरह के उपकरण बाजार में उपलब्ध हैं। फिर भी लोगों बाजार में सजी मटकों व सुराहियों की दुकानें लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। पानी ठंडा रखने का पारंपरिक मिट्टी के घड़े व सुराही से प्यास बुझाने के साथ मिठास भी दे रहा है। इन दिनों बस स्टैंड के पास, मॉडल टाउन मोड, सिटी थाने के सामने, जगाधरी वर्कशॉप रोड, रेलवे रोड, जगाधरी, मटका चौक तमाम सड़कों पर मिट्टी के घड़े व सुराहियों की दुकानें सजी हुई हैं।
मिट्टी के बर्तन विक्रेता राजकुमार ने बताया कि उनका यह पुश्तैनी कारोबार है। उनका कहना है कि आधुनिकता में उनका यह काम पिछड़ गया है। इसमें अब पहले सी बात नहीं है, लेकिन गर्मी में सुराही व घड़े लोग खरीदते हैं। उन्होंने बताया कि इस बार पिछले साल की अपेक्षा दाम तेज हैं। पिछले साल पांच लीटर का मटका 30 रुपये का था, जो अब 40 से 50 रुपये का बिक रहा है। जबकि टैब लगा वाटर कूलर की कीमत 150 रुपये तक है। वाटर कूलर लोगों को काफी पसंद आ रहे हैं।
बाजार में इन दिनों मिट्टी के मटके व सुराही नहीं, बल्कि वाटर कूलर भी उपलब्ध हैं। फ्रिज का ठंडा पानी अकसर लोगों को नुकसान पहुंचाता है। यह प्राकृतिक व पारांपरिक तरीका है। जो बहुत ही वैज्ञानिक भी है। डॉ. सौरभ ने बताया कि मिट्टी के यह बर्तन शुद्ध होते हैं। आग में तपे होने के कारण इसमें किसी प्रकार की पॉलिश व कैमिकल का प्रयोग नहीं होता है। इसमें रखने से पानी ठंडा रहता है और मिट्टी में मौजूद तत्वों से पानी मिठास सा प्रतीत होता है।