संवाद न्यूज एजेंसी
कपालमोचन। तीर्थराज श्री कपालमोचन से तीन किलोमीटर दूर उबड़ खाबड़ रास्ते से होकर श्रद्धालु मिट्टी के एक टीले को जूते, चप्पल व पत्थर मारने के लिए विशेष रूप से जाते हैं। मिट्टी का यह टीला संधाय गांव के रकबा में खेतों के बीच बना है। कहा जाता है कि मिट्टी का यह टीला प्राचीन काल में अधर्मी राजा संध का किला हुआ करता था।
देवी ग्यसनी द्वारा दिए गए श्राप के कारण उसका सर्वनाश हो गया। राजा संध को उसके द्वारा किए गए गलत कार्यों की सजा आज भी श्रद्धालु उसके टीले पर जूते, चप्पल व पत्थर मार कर देते हैं। इतना ही नहीं मिट्टी के टीले पर थूकते तो हैं ही, साथ में उसे गालियां भी देते हैं। आज राजा संध के नाम पर ही संधाय गांव बसा है।
कहा जाता है कि महाभारत काल में यह स्थान सिंधूवन के नाम से प्रसिद्ध था। राजा संध यहां पर राज करता था। परंतु जितना बड़ा वह राजा था उतना ही वह अधर्मी भी था। जब भी किसी दुल्हन की डोली उसके राज्य से जाती थी तो वह उसे लूट लेता था। साथ ही दूल्हन को अपने राजमहल में ले जाकर उनकी इज्जत से खेलता था। एक बार राजा संध ने एक ऋषि कन्या सती ग्यासनी देवी पर कुदृष्टि डाली। वह उन्हें उठाकर अपने महल ले गया।
वह स्नान के बहाने महल से भाग निकलीं। राजा संध भी उनके पीछे गया। तब ग्यासनी देवी ने उसे श्राप दिया था कि जिस महल में वह महिलाओं की इज्जत लूटता है वह एक दिन बर्बाद हो जाएगा। उससे बचने के लिए ग्यासनी देवी तालाब में कूद कर सती हो गई। इसके बाद किला मिट्टी के टीले में तब्दील हो गया। आज भी लोग देवी सती के मंदिर में जाकर पूजा करते हैं।
पुरातत्व विभाग की ओर से इस टीले को संरक्षित करने के आदेश जारी किए गए हैं। इसमें से आज भी प्राचीन अशर्फियां निकलती हैं। आसपास के लोग चोरी छिपे खोदाई करके इसमें से मोहरें निकालते हैं। कहा तो यह भी जाता है कि इस टीले में एक मंदिर है, जिसमें से रात के समय घंटियां बजने की आवाज आती हैं, जो अक्सर लोगों को सुनाई देती हैं।
टीले से आगे बना है गुरुद्वारा
टीले से कुछ कदम की दूरी पर जंगल में गुरुद्वारा बना है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि गुरु गोबिंद सिंह भंगियानी का युद्ध जीतने के बाद कपालमोचन में 52 दिन ठहरे थे। यहां आकर उन्होंने 40 दिन तक संधाय गांव के जंगल में तप किया था। वह अपने घोड़े को मिल्क खास व संधाय गांव के बीच बने प्राचीन शिव मंदिर में लगे एक पेड़ पर बांध कर जंगल में चले जाते थे। तब इस जगह को सिंधू वन कहा जाता था। यहां पर गुरुद्वारा बना है। जिसमें श्रद्धालु शीश नवाने जरूर पहुंचते हैं।