ऑटो से स्कूली सफर सुरक्षित नहीं रहा है, चूंकि चालकों को किराये की लालच में न तो नियमों की परवाह है और न ही किसी की जान जाने का डर है। तभी प्रतिबंध के बाद भी आगे ड्राइवर सीट के साथ दोनों ओर बच्चों को बैठाया जा रहा है व पीछे की सीटों पर भी क्षमता से अधिक बच्चे ढोये जा रहे हैं। चौक-चौराहों पर तैनात ट्रैफिक कर्मी भी कई बार इन्हें नजर अंदाज कर देते हैं उधर, सब कुछ जगजाहिर होने पर भी स्कूल प्रबंधन, प्रशासन व अभिभावक मौन धारण किए हुए हैं। जबकि यह लापरवाही कभी भी हादसे की वजह बन सकती है। फोग सीजन में सुबह के समय धुंध में हादसों की संभावना अधिक बढ़ जाती है। बीते वर्षों में हुए स्कूली वाहनों के हादसों के बाद भी प्रशासनिक कार्रवाई ढाक के तीन पात दिख रही है।
बीते वर्षों में स्कूली वाहनों के हादसों के दौरान जिला प्रशासन द्वारा ऑटो चालकों पर सख्ताई कर ऑटो में ड्राइवर सीट के साथ दोनों ओर की सीटें हटाने व पीछे सीटों पर क्षमता अनुसार यात्रियों को बैठाने के आदेश दिए गए थे। यह नियम महज बैठकों तक सीमित रहा, जबकि सड़कों पर इसका असर नहीं दिखाई दिया। अभी भी ऑटो चालक मनमानी कर नियमों को ताक पर रख रहे हैं। आलम यह है कि ऑटो में ड्राइवर सीट के साथ दोनों ओर सीटें ज्यों की त्यों लगी हैं। इन पर अन्य सवारियों की ही तरह ही स्कूली बच्चों को भी बैठाया जा रहा है वहीं, पीछे की सीटों पर भी क्षमता से अधिक संख्या में स्कूली बच्चों को घर से स्कूल व स्कूल से घर तक ले जाया जा रहा है।
पांच के बजाए होते हैं 10-15 बच्चे
बीते वर्षों में स्कूली वाहनों के हादसों के बाद आटो में स्कूली बच्चों को घर से स्कूल व स्कूल से घर लाने-ले जाने के लिए मापदंड तय किए थे। इसके अनुसार अगर ऑटो में सुरक्षा के सभी प्रबंध हों, तो थ्री सीटर ऑटो में ज्यादा से ज्यादा पांच स्कूली बच्चों को बैठाया जा सकता है। इसके अलावा ड्राइवर सीट के साथ दोनों ओर से सीट हटाने (ताकि आगे बच्चों को न बैठाया जा सके।), फोग सीजन में चारों ओर सेव गार्ड व रिफ्लेक्टर लगाने के निर्देश दिए गए थे। किंतु मौजूदा समय में पांच के बजाए ऑटो में 10 से 15 स्कूली बच्चों को ले जाया जा रहा है। इसमें दो से तीन बच्चे ड्राइवर के साथ दोनों ओर बनी सीटों पर बैठे होते हैं, जबकि ऑटो की खिड़की में फट्टे पर भी एक-दो बच्चे को बैठा दिया जाता है, जोकि अपने आप में खतरनाक है। इसके अलावा अधिक्तर ऑटो में सेव गार्ड व रिफ्लेक्टर भी नहीं हैं। ऐसे में फोग सीजन (दिसंबर-फरवरी) के बीच ऑटो से स्कूली सफर सुरक्षित नहीं लग रहा है।
जरा-सी चूक या गड्ढा भी दे सकता है हादसे को अंजाम
स्कूली बच्चों को क्षमता से अधिक भरकर ऑटो शहर से गुजर रहे एनएच-73 व 73ए सहित स्टेट हाईवे व अन्य सड़कों पर सरपट दौड़ते देखे जा सकते हैं। इस बीच धुंध में मार्ग पर कोई गड्ढा न दिखने पर या चालक के जरा-सी चूक में ऑटो पर नियंत्रण खो देने पर बड़ा हादसा हो सकता है। चूंकि चालक के साथ वाली दोनों ओर बनी सीट पर बच्चे बैठे होते हैं, ऐसे में स्टेयरिंग (हैंडल) को चलाने में दिक्कत होती है। ऐसे में ऑटो में क्षमता से अधिक सवारियां होने पर भी उसके अनियंत्रित होकर पलटने की संभावना बढ़ जाती है।
-अभिभावकों का तर्क-
धन-साधन व समय हैं कम, ऑटो में भेजना हुई मजबूरी: मॉडल टाउन के राजेश कुमार, राजेंद्र, गुरजंत सिंह ने कहा कि धन-साधन व समय की कमी में ऑटो से बच्चों को स्कूल भेजना अभिभावकों की मजबूरी बन गई है। वह भी नहीं चाहते कि बच्चों को कोई परेशानी हो, किंतु स्कूल बसों की कमी व उस पर लगने वाले अधिक धन से बचने के लिए उनके पास अन्य कोई विकल्प नहीं रह जाता है। स्वयं के पास स्कूल छोडने व वहां से लाने के लिए समय के अभाव में भी अभिभावकों को अपने बच्चों को ऑटो में भेजना पड़ता है।
डीएसपी ट्रैफिक ने दिए क्षमता से अधिक सवारियां न बैठाने के निर्देश
फोग सीजन में हादसों पर अंकुश लगाने के मकसद से डीएसपी ट्रैफिक उषा ने शनिवार को महिला पुलिस थाने में सड़क सुरक्षा संगठनों के सदस्यों के साथ ऑटो चालकों की बैठक ली। इसमें उन्होंने ऑटो चालकों को निर्देश दिए कि ऑटो में क्षमता से अधिक सवारियों को न बैठाएं और धुंध के कारण दुर्घटनाओं से बचने को रिफ्लेक्टर व अन्य सुरक्षा उपकरण जरूर लगाएं व अपने वाहन संबंधित सभी कागजात साथ रखें। इन निर्देशों की पालना न करने पर यातायात विभाग द्वारा सख्त कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।