सरकारी अस्पतालों की चिकित्सा सुविधाओं में सुधार के लिए प्रदेश सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। वहीं सरकारी अस्पतालों के चिकित्सक मरीजों को प्राइवेट अस्पतालों में इलाज के लिए भेज रहे है। यमुनानगर के सिविल अस्पताल में ढाई साल के बच्चे के पैर में डाली गई राड को निकलवाने के लिए पिता एक सप्ताह से चक्कर काट रहा है। अस्पताल में बच्चे का इलाज होना तो दूर, अस्पताल के हड्डी रोग विशेषज्ञ प्राइवेट अस्पताल में जाकर राड निकलवाने की सलाह दे रहे हैं। बच्चे के पिता की आर्थिक दशा ठीक नहीं है, ऊपर से नोटबंदी के चलते नोटों की भारी किल्लत बनी हुई है। ऐसे में मासूम की टांग से राड कैसे निकलेगी, इसे लेकर पिता बुरी तरह से परेशान है।
कैंप मेें रहने वाला रिकी एक प्लाइवुड फैक्टरी में मजदूरी करता है। करीब दो महीने पहले उसका ढाई साल का बेटा दीपक छत से गिर गया, जिससे उसकी टांग की हड्डी टूट गई। रिकी ने फैक्टरी से एडवांस व जान-पहचान वालों से उधार लेकर प्राइवेट अस्पताल में बच्चे का इलाज करवाया, जिस पर करीब 35 हजार रुपये खर्च हो गए। इलाज के दौरान दीपक के पैर में राड डाली गई, जिसे अब निकलवाना बहुत जरूरी है। प्राइवेट अस्पताल में बेटे के दोबारा इलाज की हैसियत न होने के कारण रिकी अपने बेटे सिविल अस्पताल पहुंचा। यहां हड्डी रोग विशेषज्ञ ने सरकारी अस्पताल में राड निकाल पाने से साफ इंकार कर दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने रिकी से कहा कि वह अपने बेटे की राड प्राइवेट अस्पताल में जाकर निकलवा ले। प्राइवेट अस्पताल में राड निकलवाने का खर्च 10 हजार रुपये बताया जा रहा है, जिसे दे पाने में रिकी असमर्थ है। वहीं इन दिनों नोटबंदी के चलते आम लोगों को दो-दो हजार के लिए बैंकों में चक्कर काटने पड़ रहे हैं। ऐसे में मजदूर रिकी को 10 हजार रुपये मिल पाना नामुमकिन है। रिकी के बेटे के इलाज में आर्थिक मदद करने वाले सचिन ने बताया कि इन दिनों सभी के पास नोटों की भारी किल्लत है। यदि कोई रिकी की मदद करना चाहे तो भी वह नोटों का जुगाड़ नहीं कर सकता। बच्चे के पैर से राड न निकलने से उसे काफी दर्द झेलनी पड़ रही है। सचिन ने बताया कि वह खुद भी सिविल अस्पताल गया था और डाक्टर से दीपक की टांग से राड निकालने की गुहार लगाई, लेकिन वे प्राइवेट अस्पताल में जाकर राड निकलवाने को कह रहे है।