यमुनानगर। इस समय गेहूं फसल की कटाई जोरों से हो रही है। गेहूं कटाई के साथ ही जिले में दमा, अस्थमा व टीबी रोगियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। गेहूं कटाई के दौरान हवा में मिल रहा भूसा सांस के साथ अस्थमा व टीबी रोगियों के शरीर में प्रवेश कर रहा है। जिससे उनका सांस लेना भी मुश्किल हो गया है। पहले सांस लेने में दिक्कत होने पर प्राइवेट व सिविल अस्पताल में रोजाना 35 से 40 मरीज पहुंच रहे थे तो अब इनकी संख्या 100 के पास पहुंच गई है। जिन्हें गेहूं कटाई के बाद से सांस लेने में दिक्कत हो रही है। चिकित्सक दवाई देने के साथ-साथ उन्हें अपनी देखभाल खुद रखने की सलाह दे रहे हैं।
जिले में इस बार गेहूं का रकबा 90 हजार हेक्टेयर है। इसमें से आधी गेहूं की कंबाइन मशीन से तो लगभग इतनी की कटाई हाथों से की जाती है। कटाई के बाद गेहूं को हडंबा मशीन से निकाला जाता है। इसके साथ ही भूसे के जो महीन कण होते हैं वह हवा में मिल जाते हैं। हवा का रूख जिस तरफ होता है भूसे के कण उसी तरफ आबादी में में पहुंच जाते हैं। इस वक्त चारों तरफ गेहूं की कटाई हो रही है इसलिए शहर से लेकर हर गांव में लोग इससे परेशान हैं।
हडंबा न चले तो हो जाएगा पशु चारे का संकट
कंबाइन से गेहूं कटवाना किसान को सस्ता व सुलभ पड़ता है। कंबाइन मशीन मात्र डेढ़ से दो घंटे में एक एकड़ में फसल की कटाई कर देती है। जबकि हाथ से काटने में तीन दिन लग जाते हैं। यह महंगा जरूर पड़ता है लेकिन हाथ से नहीं कटाई तो पशु चारे का संकट खड़ा हो जाएगा। हडंबा मशीन से पशुपालकों को भूसा मिलता है। हालांकि अब कंबाइन से कटवाने के बाद जो फसल अवशेष बच जाते हैं उनका स्ट्रा रीपर की मदद से भूसा बनाया जा सकता है। लेकिन स्ट्रा रीपर से जो भूसा बनता है वह हडंबा के बजाय बहुत बारीक होता है। डेयरी एसोसिएशन के जिला प्रधान सुरजीत सिंह का कहना है कि यह भूसा इतना बारीक होता है कि पशुओं की आंत में जमकर उन्हें बीमार कर देता है। इसलिए हडंबा मशीन से निकला भूसा ही सही होता है।
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बेवजह घर से बाहर न निकलें
शहर के सर्जन डॉ. अनिल अग्रवाल का कहना है कि वातावरण में धूल, भूसा के अत्याधिक महीन कण श्वास के जरिए फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं। जिससे दमा व अस्थमा रोगियों को सांस लेने में दिक्कत होने लगती है। इस वक्त गेहूं कटाई भी बहुत जरूरी है। ऐसे में रोगियों को अपना ध्यान खुद ही रखना होगा। इसके लिए जरूरी है कि जो लोग उक्त बीमारियों से ग्रस्त हैं वह अभी कुछ दिन बेवजह घर से बाहर न निकलें। गांवों में लोगों को ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत है, क्योंकि वहां ज्यादातर लोगों का समय घर से बाहर ही एक दूसरे के साथ बैठ कर व्यतीत होता है। गांवों में ही फसल कटाई के दौरान भूसे का असर ज्यादा देखने को मिलता है।
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बीमार होने की संभावना बढ़ जाती है
डॉ. वागीश गुटैन स्वास्थ्य विभाग के जिला निगरानी अधिकारी डॉ. वागीश गुटैन ने बताया कि अस्थमा का शिकार कोई भी व्यक्ति हो सकता है। इस मौसम में धूल ज्यादा उड़ती है। इससे एलर्जी होने के साथ व्यक्ति अस्थमा का शिकार हो जाता है। भूसे के कण इतने बारीक होते हैं कि वह दिखाई भी नहीं देते और सांस से हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। जिन्हें सांस लेने में दिक्कत हो रही है ऐसे रोगी ओपीडी में पहुंच रहे हैं। यदि ज्यादा दिक्कत हो तो तुरंत उपचार कराना चाहिए।
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क्या है अस्थमा
-अस्थमा में श्वसन नलिकाएं प्रभावित होती हैं।
-अस्थमा होने पर इन नलिकाओं में सूजन आ जाती है।
-इससे नलिकाएं संकरी व संवेदनशील हो जाती हैं और सांस लेने पर कम हवा फेफड़ों तक पहुंचती है।
-धूल व प्रदूषण के कण नलिकाओं तक पहुंचते हैं, तो बेचैनी होती है। दौरा पड़ने पर नलिकाएं बंद हो जाती हैं।
-अस्थमा के अटैक होने से मरीज को सांस लेने में परेशानी होती है।
-अस्थमा का अटैक यदि लंबा हो तो व्यक्ति की जान तक चली जाती है।